मप्र में एचआईवी संक्रमण बड़ा खतरा बन गया है। नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (नेको) ने राज्य एड्स कंट्रोल सोसायटी को पत्र भेजकर चेतावनी दी है कि अब तेज कार्रवाई की जरूरत है। वर्ना 2030 तक एड्स खत्म करने का लक्ष्य मुश्किल हो सकता है। पत्र में बताया गया है कि मप्र में एड्स के करीब 70 हजार मरीज हैं और एचआईवी की एडल्ट प्रिवेलेंस रेट 0.10% है। इंजेक्टिंग ड्रग यूजर्स में संक्रमण दर 4.20% तक पहुंच चुकी है। केंद्र ने 7 जिलों को हाई-रिस्क में माना है और यहां इडेक्स टेस्टिंग और विशेष कैंपेन के निर्देश दिए है। इनमें अशोकनगर, भोपाल, गुना, जबलपुर, नरसिंहपुर, श्योपुर और शिवपुरी शामिल हैं। यहां संक्रमण मुख्य रूप से इंजेक्शन से नशा और समलैंगिक संबंधों के जरिए फैल रहा है। इंदौर और रतलाम में भी केस डिटेक्शन तेज करने को कहा है। एड्स के 85% मरीज इलाज पर ही जिंदा हैं। भास्कर एक्सपर्ट – डॉ. हेमंत वर्मा, एआरटी प्रभारी (एंटीरेट्रोवाइरल थैरेपी), जीएमसी युवा मरीजों की संख्या बढ़ना चिंताजनक आमतौर पर भोपाल में 10 में से 1 मरीज युवा (20-30) होते थे, लेकिन पिछले दो सालों से 10 में से 3 युवाओं में एड्स के मामले आ रहे हैं। इनमें अधिकांश डेटिंग एप या पब में पार्टी के दौरान किसी से मिले और संक्रमित हो गए। भोपाल में रोजाना 10 से 12 केस एड्स के आ रहे हैं। हालांकि इसके पीछे एक कारण यह भी है कि हमने डायग्नोस तेजी से करना शुरू कर दिया है। अब हर टीबी के मरीज, गर्भवती महिला का अनिवार्य एचआईवी टेस्ट कराया जा रहा है। किसी भी मरीज में लक्षण आने पर या एनजीओ द्वारा घर-घर जाकर एचआईवी की जांच कराई जा रही है। दवाएं समय पर न लेने वाले एचआईवी मरीजों में 90% केस टीबी में बदल रहे हैं। इनकी मौत का कारण टीबी रिकॉर्ड किया जा रहा है, लेकिन पहले वे एड्स के मरीज होते हैं।


