महात्मा ज्योतिबा फुले की 135वीं पुण्यतिथि:करौली में शिक्षा पर संगोष्ठी, वंचितों को सशक्त बनाने पर जोर

महात्मा ज्योतिबा फुले की 135वीं पुण्यतिथि पर करौली में एक सेमिनार का आयोजन किया गया। इस अवसर पर शिक्षा के माध्यम से सामाजिक उन्नति और वंचित वर्गों को सशक्त बनाने पर विशेष जोर दिया गया। वक्ताओं ने समुदाय से बच्चों की पढ़ाई के लिए मिलकर सहयोग करने की अपील की। यह सेमिनार महात्मा ज्योतिबा फुले विकास संस्थान छात्रावास में आयोजित हुई, जिसका विषय “शिक्षा के क्षेत्र में महात्मा फुले का योगदान” था। कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्थान अध्यक्ष प्रेमसिंह माली ने की, जबकि जिला कर्मचारी अधिकारी संघ के जिला अध्यक्ष तुलसीराम सैनी मुख्य मेहमान के रूप में उपस्थित रहे। संगोष्ठी का शुभारंभ महात्मा ज्योतिबा फुले की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर और उन्हें श्रद्धांजलि देकर किया गया। स्वागत उद्बोधन में संस्थान अध्यक्ष प्रेमसिंह माली ने बताया कि संस्थान सामाजिक लक्ष्यों की दिशा में समन्वित प्रयासों के साथ कार्यरत है। उन्होंने महात्मा फुले द्वारा वंचित वर्गों तक शिक्षा पहुंचाने के कार्य को आगे बढ़ाने का आह्वान करते हुए कहा कि गांव-गांव और ढाणी-ढाणी तक शिक्षा की अलख जगाना आज की प्राथमिकता होनी चाहिए। प्रेमसिंह माली ने यह भी उल्लेख किया कि बढ़ती महंगाई के कारण बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाना चुनौतीपूर्ण हो गया है। उन्होंने इस चुनौती का सामना करने के लिए सामूहिक आर्थिक और शैक्षणिक सहयोग को आवश्यक बताया। मुख्य मेहमान तुलसीराम सैनी ने अपने संबोधन में कहा कि शिक्षा के बिना किसी भी समाज का विकास असंभव है। उन्होंने स्थानीय और ग्रामीण स्तर पर शिक्षा के प्रसार के लिए ठोस पहल करने तथा समाज के भामाशाहों से योग्य विद्यार्थियों को समय-समय पर आवश्यक समर्थन प्रदान करने की अपील की। कार्यक्रम में संस्थान सचिव रामगोपाल माली, कोषाध्यक्ष कल्याण माली, पूर्व पार्षद नाहरसिंह, रामसिंह पहलवान, पन्नूसिंह, गोपाल लाल माली, राधेश्याम, मन्नू ठेकेदार, धर्मी, प्रभु ठेकेदार, बाबूलाल भगत, किरोड़ी, करौली तहसील अध्यक्ष रामखिलाड़ी, पांचपुरा के पूर्व अध्यक्ष श्याम पटेल सहित अनेक गणमान्य नागरिक मौजूद रहे। सभी ने महात्मा फुले के कार्यों और विचारों को याद करते हुए बच्चों को शिक्षा से जोड़ने को समय की सबसे बड़ी मांग बताया और समाज से ऐसे छात्रों का उत्साहवर्धन करने का आग्रह किया। अंत में उपस्थितजनों ने निष्कर्ष निकाला कि शिक्षा के माध्यम से ही सामाजिक बदलाव संभव है व स्थानीय संस्थाओं, समाज और दानदाताओं के सहयोग से ऐसे प्रयासों को और व्यापक किया जाना चाहिए।

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