सियासतदां आपस में मिल बैठते हैं तो सियासत की ही बात करते हैं। यह स्वाभाविक भी है। पिछले दिनों सत्ता वाली पार्टी के कुछ मिनिस्टर इन वेटिंग और कुछ नेता मिले। अब महफिल जमी तो सियासत की नई-पुरानी बातें छिड़ गई। मौजूदा मुखिया और राज की बातें हुई तो पूर्व मुखिया रहे और सियासत में बाबोसा के नाम से विख्यात दिवंगत दिग्गज के फीडबैक सिस्टम से तुलना होने लगी। एक नेताजी ने बाबोसा के अचूक फीडबैक सिस्टम का किस्सा सुनाया। नेताजी ने बताया कि वे बाबोसा से मिलने पहुंचे तो उन्होंने सुरापान का जिक्र छेड़ते हुए उससे दूर रहने की सलाह दी। नेताजी ने ना-नुकूर की तो बाबोसा ने नेताजी किसके साथ कौन से मयखाने में गए थे, यहां तक का ब्योरा खोलकर रख दिया। हाथ जोड़ माफी मांगने के सिवा चारा नहीं था। तुलना करने वाले नेताजी ने महफिल में कहा- यह होता है फीडबैक सिस्टम। एक दूसरे नेताजी ने भी पूर्व मुखिया की सजगता का किस्सा सुनाया। नेताजी की आंखें लाल रहती थीं। घर वालों ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन बाबोसा ने पकड़ लिया था और हिदायत दी थी कि नेतागीरी करनी है तो इतने जाम मत छलकाया करो। विपक्षी संगठन मुखिया का लखटकिया मफलर और सियासी चर्चाएं
सियासत में नेताओं को बहुत सोच-समझकर रहना होता है। बोलने से लेकर पहनने-ओढ़ने तक सादगी का ध्यान रखना होता है। विपक्षी संगठन मुखिया को उनकी ही पार्टी के विधायक ने पिछले दिनों एक मशहूर विदेशी ब्रांड का मफलर गिफ्ट में दिया। नेताजी ने इस मफलर को पहनकर सार्वजनिक कार्यक्रम में भाग लिया। फोटो में महंगे ब्रांड की पहचान हो गई। मफलर की कीमत 60 हजार से लेकर एक लाख से ज्यादा तक बताई गई। सोशल मीडिया पर नेताजी को ट्रोल कर दिया तो उन्होंने बाद में इसे पहनना छोड़ दिया। विधानसभा शुरू होते ही महंगा मफलर फिर चर्चा में आया तो विपक्षी संगठन मुखिया ने मजाक के लहजे में कह दिया कि मफलर तो नकली था। इस पर गिफ्ट करने वाले विधायक ने तपाक से कह दिया कि अपने संगठन मुखिया को नकली मफलर थोड़े ही गिफ्ट करूंगा। अब सच्चाई क्या है, यह तो ब्रांड गुरु ही जानें, लेकिन लखटकिया मफलर चर्चा में जरूर आ गया है। महिला अफसर ने कहा- पोस्टिंग फोकट में नहीं मिलती
सरकार ऊपर से कुछ भी कर ले, ग्राउंड पर तो वो ही होगा जो लोकल अफसर चाहेंगे। एक औद्योगिक महत्व के इलाके से जुड़े लोकल अफसर की शिकायतों के बाद तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं। पिछले दिनों निवेश के लिए हुए जमावड़े के बाद कुछ कारोबारियों को लोकल स्तर की जमीनी हकीकत का अहसास हुआ। अब हर बात तो टॉप लेवल पर पहुंचाई नहीं जा सकती। कुछ जानकारों ने पड़ताल की तो पता लगा कि केंद्रीय मंत्री तक की भी लोकल अफसर के आगे नहीं चली। मंत्री के फोन के बाद भी कारोबारियों को राहत नहीं मिली। कारोबारियों ने बाद में सदियों से चले आ रहे सिस्टम को अपनाकर अटका हुआ लैंड अलॉटमेंट और दूसरी मंजूरियों का काम आगे बढ़ाया। एक जागरूक कारोबारी ने हार नहीं मानी। संघर्ष का रास्ता अपनाया, तो काम अटक गया। संघर्ष वाले सत्ता वाले कुछ नेताओं के सामने दर्द बयां किया। कारोबारी ने नेताओं को जो बताया उसे सुनकर हर कोई हैरान था। लोकल अफसर ने यहां तक कहा बताया कि आरएएस ऐसे ही नहीं बनते, पोस्टिंग फोकट में नहीं मिलती। स्थानीय नेताओं ने लोकल अफसर के बारे में ढेरों शिकायतें की हैं, लेकिन हुआ कुछ नहीं है। विपक्ष को किसने मनाया? सबसे बड़ी पंचायत के मुखिया का फ्लोर मैनेजमेंट
प्रदेश की सबसे बड़ी पंचायत के बजट सत्र के पहले दिन सदन के माहौल को लेकर सियासी जानकार कई तरह की चर्चाएं कर रहे हैं। जो विपक्ष पिछले सत्र में आक्रामक था, वह अचानक कैसे मान गया? जानकारों ने पड़ताल की तो पता लगा कि इसके पीछे सबसे बड़ी पंचायत के मुखिया ने ही सरकार के संकट-मोचक का काम किया। विपक्ष को मनाने से लेकर सब सेट किया। पिछली बार जिस वजह से बात बिगड़ी, उसे खुद ही सुधार लिया तो बात बन गई। राज्यपाल बिना शोर-शराबे के अभिभाषण पूरा पढ़कर चले गए। पंचायत के सबसे बड़े मुखिया के नजदीकी अब उनके संकट मोचक वाले काम को हाईकमान तक पहुंचाने की कोशिश में हैं। हालांकि यह काम तो सरकार के फ्लोर मैनेजमेंट संभालने वालों को करना था। अब संवैधानिक पद पर भले हो, लेकिन पार्टी हित तो उन्होंने देखा ही है। सत्ता वाली पार्टी में पहले दिन के फ्लेार मैनेजमेंट का क्रेडिट किसे मिलता है, इस पर खूब जोर आजमाइश हो रही है। नेताजी के रिश्तेदार अफसर ने मंत्री के खास आदमी से क्या मांगा?
सरकार के मलाईदार और गैर मलाईदार महकमों की भी माया निराली है। राजधानी के एक मलाईदार अथॉरिटी में तैनात अफसर को जिला बदर करके मूल विभाग में भेज दिया। अफसर सत्ता वाली पार्टी के एक नेताजी के रिश्तेदार हैं, इसलिए जनता से जुड़े एक महकमे वाले मंत्री से सिफारिश करवाकर राजधानी की मलाइदार अथॉरिटी में पोस्टिंग ले ली। पोस्टिंग मिलने के बाद अफसर मलाईदार अथॉरिटी की रीति-नीति में रम गए। सबको समदर्शी भाव से देखना शुरू कर दिया। इस दामपंथी-समदर्शी भाव को उन्होंने मंत्री के खास आदमी पर भी दिखा दिया। अब मेरी बिल्ली मुझको ही म्याऊं कहां तक चलता। मंत्री को पता लगते ही अफसर को जिला बदर करते हुए गैर मलाईदार महकमे में भेज दिया। पिछले दिनों जब तबादलों का पोस्टमाॅर्टम होने लगा तो यह बात बाहर आ गई। आईएएस की ब्यूरोक्रेसी के मुखिया वाली फीलिंग
ब्यूरोक्रेसी में अफसरों के दिन सदा एक से नहीं रहते। कब मलाईदार महकमे से विदाई हो जाए और कब क्रीम पोस्टिंग मिल जाए यह सब समय चक्र पर निर्भर करता है। इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े महकमे में चर्चित रहे अफसर को बड़े नेताजी से पटरी नहीं बैठने के कारण साइडलाइन कर एक निगम में तैनात कर दिया। उस निगम को कम ही लोग जानते हैं, जिसे शांति से टाइम काटना हो उसके लिए ट्रांजिट जगह की तरह है। इस निगम में तैनात आईएएस को किसी शुभचिंतक ने इससे बाहर निकलने का सुझाव दिया और कुछ गुर बताए। अब पद भले लाइमलाइट से दूर हो, लेकिन आईएएस ने जाहिर नहीं होने दिया। तपाक से बोले- यह जगह जोरदार है। यहां के चीफ सेक्रेट्री हम ही हैं। अब मन बहलाने के लिए यह ख्याल अच्छा है। मन में तो अफसर भी जानते हैं उस निगम को कोई पूछता नहीं है। सुनी-सुनाई में पिछले सप्ताह भी थे कई किस्से, पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें विधायक का मंत्री के सामने क्यों फूटा दर्द?:सत्ताधारी दल के दिग्गज नेता नहीं रुकवा पाए रिश्तेदारों के तबादले, मंत्री-अफसर में ‘शीतयुद्ध’


