लुधियाना | जैन मान्यता है कि पूर्णता प्राप्त करने से पूर्व तक तीर्थंकर मौन रहते हैं अत भगवान आदिनाथ को 1 वर्ष तक भूखे रहना पड़ा। इसके बाद वे अपने पौत्र श्रेयांश के राज्य हस्तिनापुर पहुंचे। श्रेयांस ने उन्हें गन्ने का रस भेंट किया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। वह दिन आज भी अक्षय तृतीया के नाम से प्रसिद्ध है। हस्तिनापुर में आज भी जैन धर्मावलंबी इस दिन गन्ने का रस पीकर अपना उपवास तोड़ते हैं। इस प्रकार कठोर तप करके ऋषभनाथ को कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ। वे जिनेन्द्र बन गए। ये शब्द मनीषी संत मुनि श्री विनय कुमारजी आलोक ने अक्षय तृतीय महोत्सव के अवसर पर लुधियाना तेरापंथ के विशाल सभागार मे सभा को संबोधित करते हुए कहे। कार्यक्रम की शुरुआत महिला मंडल द्वारा मंगलाचरण से किया गया। कार्यक्रम का उदबोधन मुनि अभय कुमारजी ने किया।


