भास्कर न्यूज| तमता ग्रामीण क्षेत्रों और जंगलों में महुआ के पेड़ों से फूल गिरना शुरू हो गए है। इस दौरान किसान अपने परिजनों के साथ सुबह-सुबह महुआ पेड़ों के नीचे नजर आते हैं। इन दिनों ग्रामीण महुआ बीनने के काम पर लगे हुए हैं। पेड़ के नीचे सफाई करने जंगल के भीतर सूखे पत्तों पर आग लगा रहे हैं। ताकि महुआ बीनने में आसानी हो। ग्रामीणों की इस लापरवाही से जंगल में आगजनी का खतरा बना हुआ है। ब्लाक के वनांचल क्षेत्रों में इन दिनों ग्रामीण महुआ बिनकर एकत्र कर रहे हैं, ताकि सूखने के बाद उसे बेच सके। इससे उन्हें रोजगार मिल रहा है। महुआ बीनने जंगल क्षेत्र के अधिकांश गांवों के ग्रामीण जंगल के भीतर महुआ पेड़ के नीचे पतझड़ से एकत्र सूखे पत्तों को हटाने के लिए आग लगा देते हैं। तमता निवासी बुधेश्वर यादव ने बताया कि फाल्गुन माह के दूसरे सप्ताह से महुआ के पेड़ों से फुल गिरना शुरू हो गए है। ये महुआ 2 महीने तक गिरता है। इसलिए किसान रोज सुबह उठ कर अपने पेड़ों के नीचे बैठ जाते है और सुबह से लेकर दोपहर तक महुआ चुनने का काम करते हैं। फिर एकत्रित किए गए महुआ को सुखाकर बेचते हैं जिससे किसानों को अच्छी खासी आमदनी होती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह समस्या हर साल की है। एक जगह लगी आग आस-पास के जंगलों तक फैल जाती है। उन्होंने वन विभाग से इस समस्या पर विशेष ध्यान देने की मांग की है। वन विभाग के अधिकारी ग्रामीणों से अपील कर है कि महुआ चुनने के लिए जंगल में आग न लगाएं। उन्होंने बताया कि आग लगने से प्राकृतिक रूप से बीज से उगने वाले पौधे नष्ट हो जाते हैं। यह जंगल के लिए बहुत नुकसानदायक है। सूखे पत्तों पर आग जलाने से जंगल के भीतर आग लगने की आशंका है। क्योंकि फरवरी माह के अंतिम सप्ताह से अप्रैल के दूसरे सप्ताह तक पतझड़ के चलते जंगल सूखे पत्तों से भरा रहता है। थोड़ी सी आग लगी, तो जंगल के भीतर फैल सकता है। ग्रामीण जंगल झाड़ियों में महुआ चुनने के दौरान आग लगाकर छोड़ देते हैं। जिस कारण आग धीरे-धीरे जंगलों की ओर पहुंच जाती है और विकराल रूप ले लेती है। आग लगने से जंगल में उग रहे लाखों पौधे और जड़ी-बूटियां भी जलकर राख हो जाती है। आग लगने के कारण कई जंगली जानवर पशु-पक्षी भी इसकी चपेट में आ जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों से गर्मी के आते ही जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ी है। लोग महुआ चुनने जाती है। वहीं दूसरी ओर किसान महुआ के लिए जंगल में आग लगा रहे हैं।


