महेश्वर पहुंचें अवधूत संत दादा गुरु महाराज:जलकोटी से नर्मदा तट तक उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब; मां नर्मदा का पूजन-अभिषेक किया

प्रकृति, पर्यावरण और मां नर्मदा के संरक्षण का संकल्प लेकर निकले अवधूत सिद्ध महायोगी दादा गुरु रविवार शाम पवित्र नगरी महेश्वर पहुंचे। उनके अनुयायियों ने बताया कि यह यात्रा केवल एक धार्मिक पदयात्रा नहीं, बल्कि अद्भुत तप और संकल्प का प्रतीक है। दादा गुरु पिछले 1800 दिनों से बिना अन्न ग्रहण किए, केवल जल पर जीवित रहते हुए निरंतर पदयात्रा कर रहे हैं। इसे विश्व की सबसे बड़ी निराहार नर्मदा परिक्रमा माना जा रहा है। जलकोटी से नर्मदा तट तक उमड़ा श्रद्धा का सैलाब दादा गुरु के नगर आगमन पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। जलकोटी से नर्मदा तट तक भक्तों ने पुष्प वर्षा कर उनका स्वागत किया। नगर के अनेक प्रबुद्धजनों ने चरण वंदन कर आशीर्वाद लिया। नर्मदा भवन में आयोजित स्वागत समारोह में दादा गुरु के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। नर्मदा संरक्षण के लिए पांच बड़े संकल्प अनुयायियों ने बताया कि दादा गुरु की यह परिक्रमा व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति और समाज कल्याण के लिए समर्पित है। उन्होंने मां नर्मदा को संवैधानिक रूप से ‘जीवंत इकाई’ का दर्जा देने, नर्मदा तटों पर अवैध उत्खनन पूरी तरह बंद करने, तटों पर सघन वृक्षारोपण और पर्यावरण शुद्धिकरण, गौ-वंश की रक्षा और गौ-आधारित प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने तथा मां नर्मदा की स्वच्छता और अविरल धारा के संरक्षण का संकल्प लिया है। सेवा और भक्ति के साथ हुआ कार्यक्रम यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं के लिए विशाल भंडारे का आयोजन किया गया, जहां हजारों नर्मदा भक्तों ने प्रसादी ग्रहण की। परिक्रमा वासियों के लिए गन्ने के रस की भी व्यवस्था की गई। शाम को दादा गुरु ने नर्मदा तट पर मां रेवा का विधि-विधान से पूजन और अभिषेक किया। इसके बाद रात्रि विश्राम महेश्वर में किया गया। सोमवार को मंडलेश्वर पहुंचेंगे दादा गुरु निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार दादा गुरु सोमवार दोपहर मंडलेश्वर पहुंचेंगे। उनके स्वागत को लेकर नगर परिषद और स्थानीय भक्तों द्वारा तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। आधुनिक युग में अद्भुत तप का उदाहरण आज के समय में जब बिना भोजन के कुछ घंटे रहना भी कठिन माना जाता है, तब दादा गुरु का 1800 दिनों का निराहार तप लोगों के लिए प्रेरणा और आस्था का केंद्र बना हुआ है। श्रद्धालुओं का कहना है कि दादा गुरु की ऊर्जा, ओज और तेज यह संदेश देता है कि यह शक्ति माँ नर्मदा की कृपा से ही संभव है। धर्म और प्रकृति संरक्षण का संदेश स्थानीय लोगों ने बताया कि दादा गुरु का यह कठिन तप केवल व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि मां नर्मदा, धर्म, धरा, गोमाता, प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण के लिए समर्पित है। आगे का यात्रा कार्यक्रम

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *