मैं अपनी बहन के ससुराल उससे मिलने गया था। उसने मुझसे साथ चलने की जिद की, लेकिन ससुराल वालों ने मना कर दिया। मैं घर वापस आ गया, मगर दूसरे दिन पता चला कि वह गायब हो चुकी है। अब तो सात साल हो चुके हैं, वह जिंदा भी है या नहीं.. हमें पता नहीं। ये कहते हुए ग्वालियर के रहने वाले गणेश शाक्य की आवाज भर्रा जाती है, कुछ देर के लिए शब्द उनका साथ छोड़ देते हैं। वह उस सिस्टम को कोसते हैं, जिसकी लापरवाही ने उनकी 22 साल की बहन वर्षा को सात साल पहले लापता कर दिया। आज तक परिवार को न कोई सुराग मिला, न कोई ठोस मदद। यह सिर्फ वर्षा की कहानी नहीं है। एमपी विधानसभा में पेश आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश से हर साल औसतन 10 हजार लड़कियां गायब हो जाती हैं। वह या तो किसी को बेच दी जाती है या उन्हें जबरन मजदूरी या देह व्यापार में धकेल दिया जाता है। नेशनल ह्यूमन ट्रैफिकिंग अवेयरनेस डे पर भास्कर ने ऐसे परिवारों से बात की जो बरसों से गुम बच्चियों का इंतजार कर रहे हैं। साथ ही उन बच्चियों से भी बात कर समझा जो वापस तो लौट आईं मगर आज भी उस दिन को याद कर सिहर जाती हैं। साथ ही एक्सपर्ट से बात कर समझा कि ह्यूमन ट्रैफिकिंग का चेहरा कैसे बदल रहा है। पढ़िए रिपोर्ट ग्वालियर की रहने वाली वर्षा की शादी 6 मार्च 2018 को विक्की नामक युवक से हुई थी। शादी के कुछ ही महीनों बाद, वर्षा के सपनों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। पति विक्की उसके साथ मारपीट करने लगा, गालियां देता और लगातार दहेज की मांग करता। वर्षा ने यह बात अपनी मां गोमती को बताई। मां ने बेटी के ससुराल जाकर उसे पति के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत दी, लेकिन पति ने धमकाकर और ब्लैकमेल करके उसे चुप करा दिया। 15 नवंबर 2018 को वर्षा का भाई गणेश उससे मिलने ससुराल गया। उस दिन वर्षा ने रोते हुए अपने भाई से उसे मायके ले चलने की गुहार लगाई, लेकिन भाई ने यह कहकर टाल दिया कि पति-पत्नी के बीच ऐसे झगड़े होते रहते हैं। परिवार का आरोप- पुलिस ने अपना काम ठीक से नहीं किया
गणेश ने बताया कि जब विक्की ने हमें कहा कि वह घर पर नहीं है, तो मैंने थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने पहुंचा। हमें ससुराल पक्ष पर ही शक था, लेकिन विक्की की मां पहले ही एफआईआर दर्ज करा चुकी थी। गणेश के मुताबिक हमने हर दरवाजा खटखटाया। जनसुनवाई में आवेदन दिए, गृह मंत्री अमित शाह से लेकर मुख्यमंत्री तक को लिखित शिकायत भेजी। हर जगह से केवल आश्वासन मिला, कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। गणेश बताते हैं, “पुलिस ने अपने काम को ठीक से नहीं किया, केवल रोज नई-नई तारीखें दी गईं।” इस सदमे से वर्षा का एक भाई अपनी मानसिक स्थिरता खो बैठा। एक परिवार अपनी बेटी के इंतजार में आज भी जी रहा है। उस दिन के बाद से वर्षा का कोई पता नहीं चला। गुना जिले के सिरसी गांव में एक मिट्टी की झोपड़ी में अकेले रहने वाले गजेंद्र चंदेल की आंखों में आज भी सात साल पुरानी उम्मीद जिंदा है। उनकी बेटी गीता 1 अगस्त 2017 को अचानक गायब हो गई थी। गीता सातवें महीने में जन्मी एक नाजुक बच्ची थी, जिसे गजेंद्र ने बकरी का दूध पिलाकर और रूई की खोल में रखकर पाला था। 2013 में मां के गुजर जाने के बाद, गजेंद्र ही गीता के लिए मां और पिता दोनों थे। जिस दिन गीता गायब हुई, वह सुबह 11 बजे राशन की दुकान पर केरोसीन लेने गई थी और फिर कभी नहीं लौटी। पिता ने 14 दिनों तक अन्न का एक दाना नहीं खाया और बेटी की तलाश में भटकते रहे। 3 अगस्त 2017 को जब वह आरोन थाने में रिपोर्ट लिखवाने गए, तो पुलिस ने उनकी फरियाद नहीं सुनी। गुना के तत्कालीन एसपी से मिलने के बाद, 9 अगस्त को गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज की गई। कोर्ट ने सीबीआई को दी जांच
पिता ने गांव के ही जीतेंद्र प्रजापति पर बेटी को गायब करने का आरोप लगाया, लेकिन पुलिस की जांच धीमी गति से चलती रही। हारकर गजेंद्र ने ग्वालियर हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की। कोर्ट के आदेश पर एसआईटी का गठन हुआ, 150 से ज्यादा लोगों से पूछताछ हुई, एक नाले के पास खुदाई भी की गई, लेकिन नतीजा सिफर रहा। सात साल की लंबी लड़ाई के बाद, 17 दिसंबर को ग्वालियर हाईकोर्ट ने इस केस की जांच CBI को सौंप दी। कोर्ट ने अपने फैसले में मध्य प्रदेश पुलिस के रवैये पर बेहद सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा – यह याचिका मध्य प्रदेश पुलिस की अकुशलता और उसके गैरजिम्मेदाराना रवैये को दिखाती है। यदि नाबालिग मध्य प्रदेश में सुरक्षित नहीं है और पुलिस उसे ढूंढ नहीं पा रही है, तो CBI को केस ट्रांसफर करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। खजुराहो के एक संपन्न परिवार की 14 वर्षीय दिव्या की कहानी दोस्ती में मिले धोखे की एक दर्दनाक मिसाल है। दिव्या की सबसे अच्छी दोस्त जया थी, जिस पर वह अपनी जान छिड़कती थी। 8 सितंबर 2016 को जया ने दिव्या से महोबा चलने की जिद की। वहां दोनों ट्रेन से पहुंचीं, जहां जया ने दिव्या को दो अनजान युवकों से मिलवाया। नाश्ते के दौरान दिव्या को पीने के लिए कुछ दिया गया, और उसके बाद उसे कुछ याद नहीं। जब होश आया, तो दिव्या दिल्ली के एक बंद कमरे में कैद थी। उसे समझ आया कि उसकी सबसे अच्छी दोस्त ने ही पैसों और मोबाइल के लालच में उसे बेच दिया था। तीन महीने तक उसे बंधक बनाकर रखा गया, धमकाया गया और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उसे बेचने की योजनाएं बनाई जा रही थीं। दोस्त से पूछताछ, दिल्ली में मिली दिव्या
उधर, खजुराहो में दिव्या का परिवार परेशान था। पुलिस ने 10 दिनों तक गुमशुदगी की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं की। पिता ने हार नहीं मानी और एक एनजीओ की मदद से चाइल्ड लाइन से संपर्क किया। पिता के जोर देने पर जब पुलिस ने जया से सख्ती से पूछताछ की, तो उसने सारा सच उगल दिया। जया के मोबाइल की लोकेशन ट्रैक करके पुलिस दिल्ली पहुंची और दिव्या को सुरक्षित बचाया। आरोपी जेल भेज दिए गए और नाबालिग जया को बाल सुधार गृह। लेकिन दिव्या की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई। परिवार ने डर के मारे उसकी पढ़ाई छुड़वा दी, उसे घर में कैद कर दिया और आखिरकार, समाज के तानों और डर से बचने के लिए उन्होंने खजुराहो ही छोड़ दिया। एक घटना ने पूरे परिवार को अपनी जड़ों से उखाड़ फेंका। छतरपुर के एक छोटे से गांव की 15 वर्षीय पूजा की कहानी गरीबी, मजबूरी और शोषण की परतों को उजागर करती है। माता-पिता दिहाड़ी मजदूर थे, और पूजा ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा था। उसकी बड़ी बहन की मौत के बाद, उसका 35 वर्षीय पति अक्सर घर आने लगा और पूजा के माता-पिता पर उससे शादी करने का दबाव डालता। उसने पूजा को शादी के सपने दिखाए और एक दिन, माता-पिता को 20,000 रुपए देकर उसे अपने साथ ले गया। यह शादी नहीं, एक सौदा था। कुछ ही समय बाद, उस जीजा ने पूजा को 40,000 रुपए में अपने एक दिव्यांग चाचा को बेच दिया। वहां पूजा की जिंदगी नरक बन गई। दिन भर खेतों में काम और रात में शारीरिक और मानसिक शोषण। उसका कई बार रेप किया गया, जिसके बाद वह गर्भवती हो गई। किसी तरह वह वहां से भागकर अपने माता-पिता के पास पहुंची। परिवार जब थाने गया, तो पुलिस ने यह कहकर लौटा दिया कि वह अपनी मर्जी से गई थी। कुछ समय बाद, पूजा ने एक कमजोर बच्चे को जन्म दिया। आज 21 साल की उम्र में, पूजा उसी गांव में मजदूरी करके अपने बच्चे को पाल रही है। वह कहती है, “जो मेरे साथ हुआ, उसकी सजा मेरा बच्चा क्यों भुगते?” एक्सपर्ट बोले- बदल रहा है तस्करी का चेहरा
आरंभ संस्था की निदेशक अर्चना सहाय बताती हैं कि चाइल्ड ट्रैफिकिंग अब पहले जैसी नहीं रही। पहले लड़कियों को पढ़ाई, नौकरी या पैसों का लालच देकर फंसाया जाता था, लेकिन अब यह सब वर्चुअल माध्यमों से हो रहा है। वह कहती है कि अब मोबाइल, इंस्टाग्राम और फेसबुक के जरिए दोस्ती की जाती है और वही सुनहरे सपने दिखाए जाते हैं। कई बार जब पुलिस लड़कियों की तलाश कर उन्हें वापस लाती है, तो पता चलता है कि ऑनलाइन दोस्ती हुई थी, लेकिन हकीकत में पहुंचते ही शोषण शुरू हो गया। अर्चना सहाय मानती हैं कि मध्य प्रदेश पुलिस कई मामलों में सराहनीय काम कर रही है और लगभग 95% लापता लड़कियों को ढूंढ भी लेती है, लेकिन समस्या तब आती है जब रिपोर्ट दर्ज कराने में देरी होती है। परिवार यह सोचकर इंतजार करता है कि बच्ची खुद लौट आएगी, और इसी में वह ‘गोल्डन पीरियड’ निकल जाता है। वह कहती हैं, “इलाज से बेहतर बचाव है।


