मुनि बोले- सजा देने से अधिक इंसान को सुधारा जाए:जैन दर्शन इसी पर टिका, टीकमगढ़ कोर्ट में संतों ने दिए प्रवचन

टीकमगढ़ जिला कोर्ट परिसर में सोमवार को जैन मुनि समत्व सागर महाराज और शील सागर महाराज के प्रवचन आयोजित किए गए। अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष अनिल त्रिपाठी ने दोनों संतों का स्वागत किया। इस मौके पर जिला जज सहित तमाम वकील और कोर्ट का स्टाफ मौजूद रहा। मुनि समत्व सागर महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि आज के दौर में जब अदालतों के सामने सच्चाई और नैतिकता को लेकर कई चुनौतियां हैं, तब जैन धर्म की प्राचीन न्याय-विद्या एक सही रास्ता दिखा सकती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि वही फैसला सही और प्रमाणिक माना जाता है, जिसमें किसी भी तरह का भेदभाव, लगाव या पक्षपात न हो। दंड से ज्यादा सुधार पर जोर मुनि श्री ने बताया कि जैन दर्शन की सोच सजा देने से ज्यादा इंसान को सुधारने और उसके अंदर बदलाव लाने पर टिकी है। उन्होंने ‘अनेकांतवाद’ के सिद्धांत का जिक्र करते हुए कहा कि किसी भी फैसले पर पहुंचने से पहले सभी पक्षों को पूरी गहराई से सुनना और समझना बहुत जरूरी है। न्याय केवल कानून नहीं, जीवन का आधार वहां मौजूद कानून के जानकारों और विद्वानों ने माना कि अगर जैन दर्शन की इन अच्छी बातों को जजों की ट्रेनिंग और कानून की पढ़ाई में शामिल किया जाए, तो न्याय का मतलब बदल सकता है। कार्यक्रम में यह संदेश दिया गया कि न्याय केवल बाहर ढूंढने वाली चीज नहीं है, बल्कि यह इंसान के अंदर की अपनी समझ और विवेक है। इस खास आयोजन में जिले के सभी जज, वकील और शहर के लोग मौजूद रहे।

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