मेरा काम मेरा सच:उन पेशेवरों के अनुभव जिन पर औरों की जिम्मेदारी, आज बर्न वार्ड के डॉक्टर डॉ. राकेश जैन की बात

मैं साल 1997 से बर्न वॉर्ड में काम कर रहा हूं। इतने सालों में मैंने आग को सिर्फ लपटों में नहीं, लोगों की जिंदगी में उतरते देखा है। आजकल हमारे पास इलेक्ट्रिक बर्न के मामले ज्यादा आ रहे हैं। हर साल औसतन 1500 मरीज हमारे पास आते हैं। लोग बर्न पर कोलगेट, घी, तेल, बूरा, न जाने क्या-क्या लगाकर आ जाते हैं। जिनसे इंफेक्शन बढ़ जाता है। बर्न होने पर सिर्फ नल के पानी से 15 मिनट तक धोना चाहिए उसके बाद तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए। काम के दौरान कई कहानियां देखी हैं। 19 साल के लड़के ने गलती से हाईटेंशन वायर छू लिया। मेरे पास पहुंचा, तब तक उसका हाथ जल चुका था। हमें हाथ काटना पड़ा। उसकी भोजन नली भी जल चुकी थी। सांस लेने में भी दिक्कत हो रही थी। केस इतना गंभीर था कि हमें उम्मीद बहुत कम थी, लेकिन उस लड़के को थी। हर दिन वो मुझे देखता और कहता सर मैं ठीक हो जाऊंगा। आज वो ठीक है।
एक और कहानी है, जो मुझे आज भी भीतर तक हिला देती है। बीकानेर से 9वीं कक्षा में पढ़ने वाली एक बच्ची आई थी। उसके पिता मिलिट्री में थे। रास्ते में उसे एक बम मिला, उसे नहीं पता था कि वह बम है। वह उसे घर ले आई। एक दिन वह दीवार पर फोटो टांग रही थी। कील ठोकने के लिए उसने उसी बम का इस्तेमाल किया और धमाका हो गया। उसका एक हाथ पहले ही कट चुका था, दूसरा हमें काटना पड़ा। बर्न था, पैर में फ्रैक्चर भी था। कुछ समय बाद वह ठीक हो गई। कई वर्षों सालों बाद वह मेरे पास मिठाई लेकर आई। उसने पूछा, सर, पहचाना? तब मुझे समझ आया कि वो वही बच्ची थी। उसके प्रोस्थेटिक हाथ लगे थे, लेकिन जो चीज मुझे सबसे ज्यादा चौंका गई, वह उसका आत्मविश्वास था। 10वीं में फेल होने पर एक छात्रा ने खुद पर केरोसिन डाल दिया था। वह 80-90% बर्न केस था। हम जानते थे, वो नहीं बचेगी। फिर भी हम इलाज करते रहे। मरीजों के साथ जो लोग आते हैं, वे रात को हमें फोन कर कहते हैं कि सर मुझे नींद नहीं आ रही है। किसी का 70-80% जला शरीर देखना आसान नहीं है। कोई हमारे वार्ड में 15 दिन रहता है, कोई दो महीने। गंभीर मामलों में 10-15 ऑपरेशन तक करने पड़ते हैं। कई बार हमें भी नींद नहीं आती। हालांकि स्किन बैंक आने के बाद सर्वाइवल रेट बढ़ी है। चेहरा व दूसरे अंग जलने पर लोगों का आत्मविश्वास चला जाता है। सर्जरी के बाद का इलाज भी आसान नहीं होता है। हम भी उनकी तकलीफ में दुखी होते हैं। उनके दर्द को कम करने के लिए काउंसलिंग करते हैं, लेकिन उनकी जिंदगी मुश्किल होती है।
-जैसा ईशा सिंह को बताया

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