चित्तौड़गढ़ के सीताफल एक्सीलेंस सेंटर में अब सीताफल के बाद लीची पर भी रिसर्च शुरू किया गया है। मुशहरी, मुजफ्फरपुर, बिहार के राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र अब मेवाड़ में लीची की संभावनाओं को तलाश कर रहे है। मेवाड़ के तीन जिलों के चार जगहों पर यह रिसर्च करने का निर्देश दिया गया है। उनमें से एक चित्तौड़गढ़ भी है। अनुसंधान केंद्र ने चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़ और उदयपुर के जलवायु को इसके लिए उपयुक्त माना है। ठंड का प्रभाव कम होने के बाद पौधे अपनी गति से बढ़ेंगे और लगभग 3 साल बाद इनमें फ्रूटिंग होगी। 24 पौधों का हुआ प्लांटेशन सीताफल एक्सीलेंस सेंटर के उपनिदेशक राजाराम सुखवाल ने बताया कि सीताफल के लगभग 36 वैरायटी पर यहां रिसर्च किया जाता है। लेकिन इस साल से लीची के भी ग्राफ्टेड पौधों को भी लगाया गया है। मुशहरी, मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार के राष्ट्रीय लीची रिसर्च सेंटर ने मेवाड़ के तीन जिलों में चार यूनिट को सेलेक्ट किया है। चित्तौड़गढ़ के सीताफल एक्सीलेंस सेंटर, प्रतापगढ़ के कृषि विज्ञान केंद्र, बड़गांव उदयपुर के कृषि विज्ञान केंद्र और उदयपुर के कृषि महाविद्यालय में रिसर्च के लिए लीची के पौधे भिजवाए गए हैं। चित्तौड़गढ़ में 30 पौधे भिजवाए गए जिनमें से दो महीने पहले ही 24 पौधों का प्लांटेशन किया गया है। राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र द्वारा यहां के जलवायु को उपयुक्त मानते हुए यह रिसर्च करने के निर्देश दिए गए हैं। ठंड का प्रभाव थोड़ा काम होते ही पौधे अपनी गति से बढ़ेंगे। 3 साल में इन पौधों में फ्रूटिंग शुरू होगी। मेवाड़ के इस जलवायु में लीची के पौधे कितने टिक पाते हैं, यह आगामी 3 सालों में पता चल पाएगा। फिलहाल लीची की एक ही वेराइटी यहां लगाई गई है। ठंड का समय किसी भी पौधे के लिए डोरमेंसी का समय होता है। यह ग्राफ्टेड लीची के पौधे 8 से 10 फीट तक हाइट में बढ़ेंगे। लीची के पौधों पर रिसर्च का मुख्य उद्देश्य इसके क्षेत्र का विस्तार करना है। ड्रिपिंग सिस्टम से हो रही सिंचाई उपनिदेशक सुखवाल ने बताया कि नेशनल लीची रिसर्च सेंटर द्वारा मेवाड़ में इसकी संभावनाएं ढूंढी जा रही है। पूरी कोशिश की जाएगी कि यह पौधा भी मेवाड़ की धरती पर जीवित रह सके। पौधों के बीच में 8 से 10 मीटर की दूरी रखी गई है। ड्रिपिंग सिस्टम द्वारा ही इसकी सिंचाई की जा रही है। पौधों को लगाने के लिए एक मीटर का गड्ढा खोदा गया था। लीची के पौधों को सीधा रखने के लिए डंडे का भी इस्तेमाल किया गया है। अगर यह रिसर्च सक्सेस हुआ तो ठंडे प्रदेशों में उगने वाला इस फल को राजस्थान की गर्मी में भी लगाना संभव हो पाएगा।


