यूपी में पैसे लेकर कागजों में बढ़ा रहे दिव्यांगता:सरकारी नौकरी चाहिए या पेंशन… जैसा यूज, वैसा रेट; देखिए स्टिंग

‘देखिए… दिव्यांगता का परसेंटेज बढ़ाने के 20 हजार रुपए लगेंगे… इसी में डॉक्टर का हिस्सा रहेगा। उन्हें बता देते हैं- ये अपना जानने वाला है तो हो जाता है। वे 10 हजार लेते हैं… डिसेबिलिटी 5% बढ़ा देंगे…।’ ये सौदेबाजी स्वास्थ्य विभाग के सरकारी बाबू कर रहे हैं, ये रुपया लेकर कागजों पर दिव्यांगता (डिसेबिलिटी) का परसेंटेज बढ़ा देते हैं। दिव्यांगता बढ़ाकर लेने वाले सर्टिफिकेट का यूज क्या है? अगर दिव्यांग पेंशन के लिए चाहिए तो रेट कम लगेंगे। लेकिन, सरकारी नौकरी के लिए चाहिए तो रेट ज्यादा लगेंगे। 5% डिसेबिलिटी बढ़ानी है तो 20 हजार रुपए खर्च करने होंगे। इस खेल में डॉक्टर भी शामिल हैं, जो इन बाबुओं और दलालों से मिलीभगत कर फर्जी तरीके से बढ़ाई दिव्यांगता को वेरिफाई कर देते हैं। दरअसल, डिसेबिलिटी 40% से ज्यादा है तो सरकारी नौकरियों में 4% रिजर्वेशन, कम ब्याज पर 50 लाख रुपए तक लोन, दिव्यांग पेंशन, शादी में आर्थिक सहायता जैसी सुविधा मिलती है। इसीलिए डॉक्टर-बाबू पैसा लेकर लोगों को दिव्यांग बना रहे हैं। हाल ही में मध्यप्रदेश और राजस्थान में 100 से ज्यादा ऐसे मामले पकड़े गए हैं, जिनमें फर्जी दिव्यांग सर्टिफिकेट के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल कर ली। महाराष्ट्र में तो फर्जी दिव्यांग सर्टिफिकेट लगाकर एक व्यक्ति तहसीलदार बन गया। इन घटनाओं से सवाल उठा कि क्या यूपी में भी फर्जी दिव्यांग सर्टिफिकेट बनाए जा रहे? इस सवाल के जवाब में दैनिक भास्कर की टीम ने लखनऊ और बाराबंकी में इन्वेस्टिगेशन किया। पढ़िए, पूरा खुलासा… दिव्यांगता सर्टिफिकेट में परसेंटेज बढ़ाने की कितनी घूस लगती है? इस सवाल के जवाब के लिए हमने इन्वेस्टिगेशन की शुरुआत राजधानी लखनऊ से की। हमें सोर्स से पता चला कि बलरामपुर अस्पताल में कुछ दलाल और बाबू ये काम करा रहे हैं। हम यहां पहुंचे और सबसे पहले दलाल रौनित वैद्यराज से मिले। इसके बाद बाबू सचिन कुमार प्रजापति से मुलाकात हुई। सचिन के पास ही डिसेबिलिटी सर्टिफिकेट के वेरिफिकेशन की जिम्मेदारी है। सचिन ने बताया कि 80% तक डिसेबिलिटी दिखा देंगे, इसके लिए 30 हजार रुपए लगेंगे। बाबू से हमने इसकी डील की। रिपोर्टर: डिसेबिलिटी सर्टिफिकेट बनवाना है… 4 लोगों का…। सचिन: क्या दिक्कत है…? रिपोर्टर: पैर और हाथों में दिक्कत है…। सचिन: जन्मजात है… या कोई चोट लगी है…? रिपोर्टर: जन्मजात है…। सचिन: ठीक है… शुक्रवार को आइएगा…। रिपोर्टर: क्या खर्च लगेगा…? सचिन: देखो… 25 से 30 हजार रुपए तक लगेंगे…। रिपोर्टर: डॉक्टर का खर्च भी इसी में रहेगा क्या…? सचिन: हां, डॉक्टर का भी इसी में रहेगा…। रिपोर्टर: डिसेबिलिटी 80% तक बनवा देंगे न…? सचिन: हां। काम कराने के लिए पीछे पड़ा दलाल
सचिन से मुलाकात के बाद जैसे ही हम बाहर निकले, दलाल रौनित वैद्यराज ने हमें आवाज देकर बुलाया। हमने रौनित को बताया कि सचिन 30 हजार रुपए रेट बता रहा है। इस पर रौनित का कहना था कि उसके चक्कर में न पड़ें, मैं करा दूंगा। रौनित: हम आपको काफी देर से देख रहे थे…। रिपोर्टर: अभी सचिन से बात हो रही थी… वो यहां नौकरी करता है कि ऐसे ही खड़ा था…? रौनित: नौकरी करता है। अरे, आप हमको बताइए… सचिन हमको जानता है… अच्छे से…। रिपोर्टर: अभी हमारी उससे बात हुई है। अभी देखेगा तो कहेगा कि इधर भी बात कर रहे हैं और उधर भी…। रौनित: आप सचिन को जानते हैं क्या…? रिपोर्टर: नहीं, अभी यहीं मुलाकात हुई है…। रौनित: अरे… तो आप उसको बता दीजिए कि हमसे बात हो चुकी है। हमारे केस में वह नहीं पड़ता। रिपोर्टर: वो 25 से 30 हजार रुपए बता रहा है… पर केस…। रौनित: आपने उधर ही बात कर ली… जब हमने कहा था… मैं करा दूंगा…। रिपोर्टर: अरे तो अभी फाइनल थोड़े कर दिया है। हमको 30 हजार रुपए बताया है। 5 हम रखेंगे, 25 हजार रुपए वो लेगा। रौनित: …तो हम अपने सर (डॉक्टर) से बात करें…? रिपोर्टर: ठीक है… बात करो। और उनको इधर ही ले आओ। मेरे पास 3 केस है… एक मेरा भी है। 40% बना था, इसको भी बढ़वाना है। रौनित: तीनों मरीज आज आए हैं…? रिपोर्टर: नहीं, आज नहीं हैं। शुक्रवार को लाएंगे। रौनित: ठीक है… मैं बात करके आता हूं…। रौनित से हुई बातचीत से साफ हो गया कि यहां दलाल हावी हैं। डिसेबिलिटी का परसेंटेज बढ़ाने के लिए उनकी डॉक्टरों से मिलीभगत है। डॉक्टर के कान में बुदबुदाया दलाल, फिर हमसे कहा- काम हो जाएगा
हमसे बात करने के बाद दलाल रौनित ने मास्क लगाया और सामने के हॉल में चला गया। यहां मेडिकल बोर्ड की टीम के मुख्य डॉक्टर रवि कुमार अपने काम में लगे थे। रौनित उनके पास जाकर खड़ा हो गया। रौनित ने हमें भी हॉल के भीतर आने का इशारा किया, तो हम भी हॉल में खड़े हो गए। कुछ देर बात जब डॉ. रवि अपने काम से फ्री हुए तो रौनिक ने उनके कान में बुदबुदाया। फिर हमारी ओर इशारा किया। डॉक्टर ने हमारी ओर देखा फिर रौनिक से कुछ कहा। इसके बाद रौनित हॉल से बाहर आ गया। हम भी उसके पीछे आ गए। रौनित ने कहा- बात हो गई है… उन्होंने बोल दिया है। दूसरा बाबू भी काम करने के लिए तैयार
इसके बाद दलाल रौनित हॉल के भीतर गया और बाबू विनोद को साथ लेकर आया। विनोद और रौनित यह साबित करना चाहते थे कि वे बाबू सचिन के बताए रेट 30 हजार रुपए से कम में काम करा देंगे। इनके रेट जानने के लिए हमने बाबू विनोद से बातचीत की। रिपोर्टर: 3-4 केस हैं… हो जाएगा? विनोद: हां, हो जाएगा… अभी बहुत काम है…। रिपोर्टर: अरे… बता तो दो कि सचिन से कराएं कि तुमसे हो जाएगा…? विनोद: पर्चा जमा है? रिपोर्टर: नहीं…। विनोद: दिक्कत क्या है? रिपोर्टर: पैर में दिक्कत है। विनोद: ठीक है करा देंगे। रिपोर्टर: सचिन ने जो बताया है, उतने में ही होगा कि कुछ कम में? विनोद: नहीं भाई… हमारा इतना नहीं लगता। ये (दलाल रौनित की ओर इशारा करते हुए) आपको बता देगा। इससे साबित हो गया कि दलाल रौनिक की न केवल बाबुओं से, बल्कि डॉक्टरों से भी मिलीभगत है। फर्जी सर्टिफिकेट का ये धंधा राजधानी लखनऊ में चल रहा है। अब चलिए, बाराबंकी… क्या दूसरे जिलों में भी फर्जी सर्टिफिकेट बन रहे? इस सवाल के जवाब के लिए हम बाराबंकी के CMO ऑफिस पहुंचे। यहां हमने CMO के स्टेनो अंकुर वर्मा के बारे में पता किया। एक कर्मचारी ने बताया- वे अभी बाहर गए हैं। हमने कर्मचारी को बताया कि डिसेबिलिटी सर्टिफिकेट बनवाना है, लेकिन दिव्यांगता 40% से ज्यादा कराना है। कर्मचारी हमें उस जगह ले गया, जहां मेडिकल बोर्ड दिव्यांग सर्टिफिकेट बनाता है। यहां हमारी मुलाकात बाबू विनय यादव से हुई। बाबू बाहर आया और अपना मोबाइल नंबर देकर कहा कि अभी बिजी है। एक घंटे बाद कॉल करके मिल लीजिए। एक घंटे इंतजार के बाद ऑफिस के बाहर चाय की दुकान पर बाबू विनय से हमारी मुलाकात हुई। यहां बाबू विनय ने हमें 5% डिसेबिलिटी बढ़ाने का चार्ज 20 हजार रुपए बताया। विनय: अच्छा बताइए… उनको दिक्कत क्या है? क्या वो सभी हड्‌डी वाले हैं, एक्सीडेंटल हैं या जन्मजात हैं? रिपोर्टर: हां, सभी जन्मजात हैं। आपको थोड़ी-बहुत मेहनत करनी पड़ेगी, 2-4% बढ़वाना पड़ेगा। विनय: वो तो अलग बात है। बस हम यह जानना चाहते हैं कि उसमें कोई एक्सीडेंटल तो नहीं है? रिपोर्टर: नहीं ऐसा कोई नहीं है। विनय: आंख वाला (दृष्टिहीन) भी कोई है क्या? रिपोर्टर: हां, एक आंख गड़बड़ है। विनय: ठीक है, वो भी करा देंगे। हड्‌डी वाले कितने हैं? रिपोर्टर: 4 हड्‌डी वाले हैं, 2 आंख वाले हैं। पैसा कितना लेंगे… बता देते तो क्लाइंट को बता देते… अपना भी जोड़कर। विनय: कैंडिडेट देखकर ही बता पाएंगे। रिपोर्टर: अरे… बता दो… नहीं तो वे सब गांववाले हैं, बहुत होशियार हैं। विनय: क्या उम्र है, बिना देखे कैसे बता दें। सबका अलग-अलग सिस्टम है। रिपोर्टर: देखो, सबका सर्टिफिकेट बनना है। बस 2-4% कम होगा तो वही तुमको बढ़वाना होगा। विनय: चलो, कैंडिडेट ले आना हो जाएगा। बाबू विनय से हुई बातचीत में साफ हो गया कि वह सबके सर्टिफिकेट में परसेंटेज बढ़ाने के लिए तैयार है, लेकिन एक बार कैंडिडेट को लाना होगा। अब हम जानना चाहते थे कि डिसेबिलिटी बढ़ाने के क्या रेट हैं? इसके जवाब के लिए हमने बाबू विनय से बातचीत जारी रखी। नौकरी में सर्टिफिकेट लगाना चाहते हैं, तो उसका अलग रेट है रिपोर्टर: ये बताओ… डॉक्टर साहब लेते हैं कि नहीं…? विनय: क्यों नहीं लेते? रिपोर्टर: पर केस कितना लेते हैं? विनय: ये नहीं बता सकते। जैसे- ये बता देते हैं कि साहब ये अपना जानने वाला है, तो हो जाता है। मैं इस तरह से नहीं करता… केस देखने के बाद ही ये सब किया जाता है। रिपोर्टर: मान लो, किसी की डिसेबिलिटी 35% है तो 40% कराना है… उसका क्या लेते हो? विनय: देखिए, मेन बात यह है कि उसका यूज क्या है? जैसे- कोई नौकरी में लगाना चाहता है तो उसका अलग रेट है। देखिए… आई वालों का 30% ही बनता है। उसका अपने हिसाब से जिला अस्पताल में जाकर जांच कराएंगे। बाकी हड्‌डी वालों का एक बार देख लेंगे तो उसी समय बता देंगे। इसमें डॉक्टर कितना लेते हैं? इस सवाल के जवाब के लिए हमने बाबू विनय से आगे बातचीत की। 5% बढ़ाना होगा तो 20 हजार रुपए लगेंगे रिपोर्टर: यदि 2-4% किसी का कम होगा तो उसके लिए डॉक्टर से ही तो बात करते होगे न…? विनय: हां, डॉक्टर से ही बात करते हैं…। रिपोर्टर: तो इसके लिए क्या लेते हो? विनय: देखिए हमारे केस तो बहुत लंबे-लंबे हैं, जैसे- 15 से 20 हजार रुपए में कर देते हैं। रिपोर्टर: एक केस का…? विनय: और क्या…? रिपोर्टर: यानी जिसका 4 से 5% बढ़ाने वाला होगा… उसके 15 से 20 हजार रुपए लगेंगे? विनय: हां…। रिपोर्टर: यानी मैं क्लाइंट को 20 हजार रुपए बता दूं तो मुझे क्या मिलेगा? विनय: अरे, 5 हजार रुपए आपको दिला देंगे… लेकिन एक बार बंदे दिखा दीजिएगा। रिपोर्टर: अच्छा, डॉक्टर साहब कितना लेते होंगे…? विनय: हां, 10-15 हजार रुपए… वो हम जैसे मैनेज करें। रिपोर्टर: यानी एक केस पर 10 हजार रुपए बचा लेते हो। यहां मुख्य डॉक्टर कौन है? विनय: डॉ. अफसर खान। साफ है कि 5% डिसेबिलिटी बढ़ाने के डॉक्टर 10 से 15 हजार रुपए लेते हैं। यहां किए स्टिंग से साफ हो गया कि ये काम केवल राजधानी लखनऊ में ही नहीं, आसपास के जिलों में भी चल रहा। अब समझते हैं, डिसेबिलिटी का परसेंटेज कैसे तय होता है?
इसके लिए हर जिले में मेडिकल बोर्ड बने हैं। इसमें 2-3 सीनियर डॉक्टर, संबंधित बीमारी के स्पेशलिस्ट डॉक्टर होते हैं। ये सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की गाइडलाइन के आधार पर डिसेबिलिटी का परसेंटेज तय करते हैं। जैसे- अगर एक पैर नहीं है तो 50% डिसेबिलिटी, दोनों पैर नहीं है तो 100% डिसेबिलिटी होती है। एक हाथ नहीं है तो 40% डिसेबिलिटी होती है। हालांकि अंगों की खराबी को लेकर बोर्ड अपने विवेक के आधार पर इसका परसेंटेज तय करता है। बस, यहीं पर परसेंटेज बढ़ाने का खेल होता है। अगर 40% से कम डिसेबिलिटी मिलती है तो उसे दिव्यांग नहीं माना जाता। अब जानिए, 40% से ज्यादा दिव्यांगों के लिए कौन-कौन सी योजनाएं हैं? कौन, क्या डील करता है, मुझे नहीं पता
इस संबंध में जब हमने डॉक्टर रवि कुमार को बताया कि आपके पास खड़े होकर दलाल दिव्यांग सर्टिफिकेट बनाने की डील करते हैं। इस पर उनका कहना है- सबको आसपास खड़े होने से रोका नहीं जा सकता। हम परीक्षण कर ईमानदारी से सर्टिफिकेट बनाते हैं
हमने डॉ. अफसर खान को बताया कि आपके यहां कार्यरत कर्मचारी दिव्यांग सर्टिफिकेट बनवाने का पैसा लेता है। वो आपका नाम बताता है कि उन्हें भी देना होता है। उनका जवाब था, हमारे यहां ईमानदारी से सर्टिफिकेट बनते हैं। ———————– ये खबर भी पढ़ें… SIR- क्या UP में BJP को 63 सीटों पर नुकसान, सपा 41 पर पिछड़ सकती है SIR के बाद उत्तर प्रदेश में 2.88 करोड़ वोटरों के नाम कट गए हैं। 14 दिसंबर, 2025 को भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की ताजपोशी के दौरान सीएम योगी इसे लेकर आगाह किया था। कहा था- यदि छूटे वोटरों को समय रहते नहीं जोड़ा गया, तो 10 हजार से कम मार्जिन वाली सीटों पर भाजपा को सबसे अधिक नुकसान की संभावना रहेगी। पढ़ें पूरी खबर

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