जेईसीआरसी यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर आर्ट्स एंड आइडियाज (CAI) की ओर से प्रस्तुत नाट्य-प्रस्तुति जलियांवाला बाग 1919 ने रंगमंच पर इतिहास की पुनरावृत्ति करते हुए दर्शकों को 13 अप्रैल 1919 की उस भयावह दोपहर में लौटा दिया, जब जनरल डायर के आदेश पर निर्दोष लोगों पर गोलियां बरसाई गई थीं। राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित इस प्रस्तुति ने दर्शकों को न केवल भावनात्मक रूप से झकझोरा, बल्कि देशभक्ति की भावना से भी ओतप्रोत कर दिया। त्रासदी की पीड़ा को दर्शाया प्रसिद्ध रंगकर्मी अशोक बांठिया और कुलविंदर बक्शी की ओर से निर्देशित इस नाटक की प्रभावशाली मंच सज्जा, संवाद, ऐतिहासिक वेशभूषा और कलाकारों की जीवंत अभिव्यक्ति ने दर्शकों को उस त्रासद दिन की वास्तविकता से जोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इस अवसर पर जेईसीआरसी यूनिवर्सिटी के वाइस चेयरपर्सन अमित अग्रवाल ने कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि ऐसी प्रस्तुतियां युवाओं को उनके इतिहास से जोड़ती हैं और उनके भीतर मानवीय संवेदनाएं, सामाजिक उत्तरदायित्व तथा देशभक्ति जाग्रत करती हैं। यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट विक्टर गंभीर ने इसे एक ‘अनुभव’ बताते हुए कहा कि मंचन केवल अभिनय नहीं था, बल्कि इतिहास को महसूस कराने की एक कोशिश थी। वहीं, सेंटर के चेयरपर्सन प्रसन्ना खमेसरा ने भावुक होते हुए कहा कि यह नाटक आत्मा से निकली एक पुकार थी, जिसने दर्शकों को उस दौर की पीड़ा से सीधे जोड़ा। आलोकनामा ने दर्शकों के मन को छूआ कार्यक्रम के दूसरे सत्र में वरिष्ठ रंगकर्मी, कवि और गीतकार आलोक श्रीवास्तव की ओर से प्रस्तुत एकल काव्य-प्रस्तुति “आलोकनामा” ने कार्यक्रम को संवेदनशील ऊंचाइयों तक पहुंचाया। यह प्रस्तुति समाज, संबंधों और आत्ममंथन की गहराइयों को स्पर्श करने वाली रही। सहज भाषा और प्रभावशाली अभिव्यक्ति के माध्यम से आलोकनामा ने दर्शकों के मन को भीतर तक छू लिया। कार्यक्रम में जेईसीआरसी यूनिवर्सिटी के विभिन्न विभागों – इंजीनियरिंग, साइकोलॉजी, कंप्यूटर साइंस, जर्नलिज्म, फॉरेंसिक साइंस आदि के विद्यार्थियों ने सक्रिय भागीदारी निभाई। उनका समर्पण और टीम भावना पूरे आयोजन की सफलता का प्रमुख आधार रहा।


