रांची | मेन रोड इकरा मस्जिद के इमाम कारी मोहम्मद एहसान ने कहा कि रोजा इस्लाम का चौथा अरकान (इस्लाम के मूल सिद्धांत) है। सन 2 हिजरी में रमजानुल मुबारक का रोजा फर्ज किया गया। सभी को रोजा रखना फर्ज है। रोजे में खाना-पीना, सोहबत करना, फहश (बुराई) चीजों से बचना, खाली अल्लाह की रजा के लिए उनकी खुशी के लिए रमजानुल मुबारक का रोजा रखा जाए। रोजा रखकर लड़ाई, झगड़ा, झूठ, फरेब, धोखा इन तमाम चीजों से बचा जाए। रोजे में हर दिन रोजे की नियत करना जरुरी है। कारी एहसान ने बताया कि गमखारी व सब्र का यह महीना है और अल्लाह से करीब होने का जरिया है। शरीर के अंदर जो खराबी है वह रोजे से हो जाती है दूर : तरावीह की नमाज चांद देखकर शुरू किया जाए व चांद खत्म होने पर बंद किया जाए। जो शख्स अल्लाह की रजा के लिए अल्लाह की खुशी के लिए तरावीह की नमाज पढ़ता है। अल्लाह ताला उनके गुनाहों को माफ कर देते हैं। एक हदीस में है कि रोजा रखो और सेहतयाब (तंदरुस्त) हो जायो। अगर शरीर के अंदर जो खराबी है वह रोजे से दूर हो जाती है, इसलिए रोजा रखना चाहिए। हर मुसलमान पर तरावीह की नमाज जरुरी : कारी एहसान ने बताया कि आसमानी जितनी किताबें हैं, इसी रमजान के मुबारक माह के अंदर उतारी गई। इस माह की अहम बात यह है कि माहे रमजान में तीन अशरे होते हैं पहला अशरा रहमत है, दूसरा मगफिरत और तीसरा अशरा जहन्नम से छुटकारे का है। इसलिए हम हिम्मत के साथ रोजा रखे और तरावीह की नमाज पढ़े। हर मुसलमान पर तरावीह की नमाज वाजिब (जरुरी) है। हदीस में है कि आका व मौला ने फरमाया जो शख्स सवाब की नियत से रोजा रखता है, अल्लाह ताला उसके गुनाहों को माफ कर देते हैं।


