संस्कृति विभाग द्वारा गणतंत्र दिवस पर आयोजित किया जाने वाला लोकरंग मेला इस बार लोककला से अधिक अव्यवस्था और मनमानी को लेकर विवादों में है। जनजातीय लोककला एवं बोली विकास अकादमी के तत्वावधान में 26 से 30 जनवरी तक चल रहे मेले में दुकानों के आवंटन, स्थान चयन और सुरक्षा इंतजामों पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।
परंपरागत रूप से रवींद्र भवन परिसर में आयोजित होने वाले इस मेले में इस बार कृषि विभाग को पार्किंग एरिया में दुकानों के लिए जगह दे दी गई। नाले के ऊपर पटिया डालकर दुकानें बनवाई गईं। इसी स्थान पर चिकनकारी, कांजीवरम, खादी और गोंड चित्रकला जैसी पारंपरिक दुकानों को लगाया गया। दुकानदारों की संख्या बढ़ने पर आनन-फानन में डेढ़ किमी दूर एमवीएम परिसर में दुकानें बनवाई गईं, लेकिन वहां न तो पर्याप्त सुरक्षा है और न ही ग्राहकों की आवाजाही। बाद में आधी से ज्यादा दुकानों को पार्किंग विकसित करने के नाम पर तुड़वा दिया गया। शुल्क रवींद्र भवन के नाम पर लेने के बावजूद दुकानदारों को एमवीएम भेजे जाने से नाराजगी बढ़ी। दुकानों के आवंटन में पर सवाल उठ रहे हैं । सूची में 18 ऐसे नाम मिले, जो लॉटरी प्रक्रिया में शामिल नहीं थे। सीधी बात – अशोक मिश्रा, सहायक निदेशक
जनजातीय लोककला एवं बोली विकास अकादमी रवींद्र भवन की बजाय एमवीएम में दुकानें क्यों बनाई गई?
–अधिक लोग आ गए थे, इसलिए वहां व्यवस्था कराई है। लेकिन लोग तो वापस फुटपाथ, नाले के पास दुकानें लगा रहे हैं, एमवीएम में कोई इंतजाम भी नहीं है?
– अब हम लोगों को रोक तो नहीं सकते। जब जगह नहीं थी तो फिर कृषि विभाग को क्यों दुकानें दी गई?
– वो हमने नहीं दी, वीर भारत न्यास ने आवंटित की है। बिना लॉटरी कई लोगों को रवींद्र भवन में दुकानें आवंटित कर दी?
–इसकी मुझे जानकारी नहीं है। चेक करवाता हूं।


