राजस्थान का एक बांध, जिसने उजाड़ दी पूरी ढाणी:4 हजार बीघा में फसल खराब हुई, मवेशी बीमार हुए; किसान खेती छोड़कर मजदूरी कर रहे

हमारी छापरिया की ढाणी में करीब 100 बीघा जमीन है। लेकिन सालभर से वहां नेहड़ा बांध से आने वाला केमिकल युक्त पानी भरा है। अब वहां फसल नहीं होती है। इसी कारण 30 साल पहले ढाणी छोड़कर राजपुरा में आकर बसना पड़ा। अब हम खेती छोड़ मजदूरी करते हैं। केमिकलयुक्त पानी खेतों में भरा होने से जमीन खराब हो गई। कोई फसल नहीं होती, मवेशी बीमार रहने लगे। इसके कारण 30-35 साल पहले छापरिया की ढाणी में अपने कच्चे मकान छोड़कर कर ढाणी से करीब 4 किलोमीटर दूर राजपुरा में आकर बस गए हैं। यह दर्द है उन किसानों का, जिन्हें अपने खेत और जमीन छोड़नी पड़ी। केमिकल युक्त पानी के कारण बसा बसाया आशियाना छोड़कर दूसरे स्थान पर जाना पड़ा और फिर से तिनका- तिनका जोड़कर घर बनाने पड़े। आमतौर पर जब किसी बांध में पानी भरता है, तो किसानों के चेहरों पर खुशी आती है। लेकिन राजस्थान के पाली जिले में एक बांध ऐसा भी है, जिसके न भरने की दुआ की जाती है। इस बांध का दूषित पानी क्षेत्र के किसानों और ग्रामीणों के लिए वरदान नहीं, बल्कि अभिशाप साबित हो रहा है। बांध का जलस्तर बढ़ते ही आसपास के खेतों में केमिकलयुक्त पानी भर जाता है। हालात इतने भयावह हो गए कि बांध के पानी के कारण एक पूरी ढाणी वीरान हो गई। पहले देखिए- 3 तस्वीरें केमिकल के पानी ने वीरान कर दी ढाणी
पाली जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूरी पर रोहट क्षेत्र में छापरिया की ढाणी (गढ़वाड़ा) है, यहां करीब 30 साल पहले 30 से 35 परिवार रहते थे। इन परिवारों की यहां सैकड़ों बीघा में फैले खेत है। दर्जनों मवेशी भी रखे हुए थे। लेकिन धीरे-धीरे पूरी ढाणी एक बांध के कारण वीरान हो गई। किसानों के अनुसार- पाली के औद्योगिक क्षेत्रों की फैक्ट्रियों का पानी बांध तक पहुंचने लगा। बांध से निकला रसायनिक पानी खेतों में भरने लगा। निकासी की कोई व्यवस्था नहीं होने के कारण यहां के खेत खराब होने लगे। इंसान ही नहीं, जानवर तक इस पानी के कारण बीमार होने लगे। ऐसे में करीब 30 साल पहले पूरी ढाणी के लोगों ने सर्व सम्मति से दूसरी जगह बसने का निर्णय लिया। बेबसी में ढाणी छोड़ी, 4 किलोमीटर दूर आकर बसे
छापरिया की ढाणी के निवासी ग्रामीण बुधाराम बताते है- आज से करीब 30 साल पहले पूरी ढाणी के लोगों ने मिलकर निर्णय लिया कि उन्हें ढाणी छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि खेतों में केमिकलयुक्त पानी भरा है। इससे खेत खराब हो गए है। कोई फसल या पैदावार नहीं हो सकती है। केमिकल युक्त रंगीन पानी पीने से मवेशी भी बीमार होने लगे। सेहत पर पड़ रहे बुरे असर को देखते हुए करीब 30 साल पहले छापरिया की ढाणी में अपने कच्चे मकान छोड़कर कर ढाणी से करीब चार किलोमीटर दूर राजपुरा में आकर बसे। ढाणी में आज भी किसानों के घर- हौद मौजूद
राजपुरा गांव में रहने वाले भगाराम पटेल का कहना है- आज ढाणी वीरान पड़ी है। वहां झाड़ियां उगी हुई है। लेकिन कभी यहां लोग बसते थे। उसके अवशेष ईंटों, मंदिर, गांव का सामूहिक पानी का होद आज भी वहां मौजूद है। इससे साफ पता लगाया जा सकता है कि पहले वो ढाणी कितनी समृद्ध रही होगी और कितने लोग वहां बसते थे। किसान बोले- कहने को 100 बीघा जमीन, लेकिन बंजर
राजपुरा गांव में रहने वाले अणदाराम पटेल ने बताया कि छापरिया की ढाणी में उनका परिवार भी रहता था। वहां उनकी करीब 100 बीघा जमीन है। वहां आज सालभर नेहड़ा बांध से आने वाला रासायनिक पानी भरा रहता है। इसके कारण फसल नहीं होती है। मवेशी तक वो पानी नहीं पी सकते हैं। इसके कारण 30 साल पहले ढाणी छोड़कर राजपुरा में आकर बसना पड़ा। आज खेती छोड़कर मजदूरी का काम करते हैं। बच्चों को भी रोजगार के लिए पूणे-बैंगलुरू भेजा है। करीब 4 हजार बीघा जमीन बंजर हुई
राजपुरा रहने वाले 67 साल के नेमाराम का कहना है- उनका परिवार भी छापरिया की ढाणी में रहता है। लेकिन नेहड़ा बांध में आए केमिकल युक्त पानी ने सब उजाड़ दिया। खेत में खड़ी फसल बर्बाद होने लगी। आखिर में हमें हमारी खुद की जमीन छोड़नी पड़ी। जहां 30 से 35 परिवार रहते थे। उनकी करीब चार से पांच हजार बीघा जमीन थी, वो आज खराब हो चुकी है और बंजर जैसे हालात है। ग्रामीण बोले- आज तक नहीं मिला मुआवजा
ग्रामीणों ने बताया कि बांध में आए औद्योगिक केमिकल के कारण सैकड़ों बीघा जमीन खराब हो गई। वहां रहने वाले किसान पाई पाई के लिए मोहताज हो रहे थे। लेकिन सरकार ने भी उन्हें किसी प्रकार का कोई मुआवजा नहीं दिया। हम जमीन बेचना चाहते है, लेकिन कोई खरीदार नहीं है। ग्रामीणों की मांग है कि स्थानीय प्रशासन को खेतों में भरे रासायनिक पानी की निकासी की व्यवस्था करनी चाहिए। नहीं तो नेहड़ा बांध में आ रहे फैक्ट्रियों के रंगीन पानी को रोका जाना चाहिए, जिससे खेत फिर से फसलों से लहलहा सके। रिटायर्ड जज ने भी जताई थी नाराजगी
पिछले महीने रिटायर्ड जस्टिस संगीत लोढ़ा और उनकी टीम ने नेहड़ा बांध से लेकर पाली के औद्योगिक क्षेत्र का निरीक्षण किया था। नेहड़ा बांध में रंगीन पानी देख उन्होंने नाराजगी जताई थी। राजपुरा गांव के रहने वाले किसानों ने उन्हें छापरिया की ढाणी के बर्बाद होने और खेतों में भरे रंगीन पानी को भी दिखाया था, जिससे कुछ समाधान निकल सके। लेकिन मामले में बीते 30 से 35 सालों से हालात जस के तस है।

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