रूस, मंगोलिया और कजाकिस्तान से अफगानिस्तान के रास्ते भारत आने वाले साइबेरियन सारस (कुरजां) अब राजस्थान में भी ठिकाना बदल रहे हैं। भरतपुर, जैसलमेर, बाड़मेर और चूरू के बाद बीकानेर के लूणकरणसर की वेटलैंड में इस बार 25 हजार से ज्यादा कुरजां आए हैं। यह संख्या पिछली बार के सभी रिकॉर्ड से ज्यादा है। ये करीब 26 हजार फीट की ऊंचाई तक उड़ सकते हैं। झुंड में उड़ते समय “V” आकार बनाते हैं। दिसंबर से फरवरी तक यहां रहने के बाद प्रवासी पक्षी फिर से साइबेरिया के लिए उड़ान भरते हैं। वे राजस्थान आने और फिर वापस जाने में करीब 10 हजार किलोमीटर तक की दूरी तय करते हैं। प्रवासी परिंदों को देखने के लिए देश-विदेश से सैलानी यहां आ रहे हैं। परिंदों की अठखेलियों को कैमरे में कैद किया जा रहा है। 10 सालों में 50 गुना हुए कुरजां
बीकानेर क्षेत्र में कुरजां का आगमन पिछले करीब 10 सालों से दर्ज किया जा रहा है। 2018 के बाद संख्या में स्पष्ट बढ़ोतरी दिखने लगी। पहले शुरुआती सालों में औसतन 500 से 700 कुरजां आते थे। तब ये छोटे-छोटे झुंडों में आती थीं। फिर इनकी संख्या 6 हजार तक पहुंची। इस बार करीब 25 हजार रिकॉर्ड संख्या दर्ज की गई है। हर साल संख्या में 20 से 30 परसेंट की बढ़ोतरी हो रही है। इसका कारण है लूणकरनसर और आसपास के गांवों में इनकी बैठने की पर्याप्त व्यवस्था। -50 डिग्री से राजस्थान की गर्मी तक का सफर
ये प्रवासी पक्षी डेमोसाइल क्रेन (Demoiselle Crane) हैं, जो मंगोलिया, कजाकिस्तान और साइबेरिया (रूस) जैसे ठंडे क्षेत्रों से सितंबर-अक्टूबर में उड़ान भरते हैं। हजारों किलोमीटर की लंबी यात्रा तय कर ये पक्षी नवंबर के अंत तक राजस्थान पहुंचते हैं और फरवरी अंत तक यहीं रहते हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार- इनके मूल देशों में सर्दियों के दौरान तापमान माइनस 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, जिससे जीवन कठिन हो जाता है। यही कारण है कि अपेक्षाकृत अनुकूल मौसम वाले राजस्थान को ये पक्षी अपना ठिकाना बनाते हैं। 40 सालों से बीकानेर से जुड़ा है कुरजां का रिश्ता
कुरजां पिछले करीब 40 सालों से बीकानेर और आसपास के क्षेत्रों में आ रहे हैं। लूणकरणसर क्षेत्र की खारे पानी की झील इन्हें विशेष रूप से पसंद है। खारे जल में पनपने वाले सूक्ष्म जलीय जीव, शैवाल और कीट कुरजां के प्राकृतिक आहार का अहम हिस्सा होते हैं। इसके साथ ही सेलेनाइट अयस्क भी कुरजां को पसंद आता है। कम मानव गतिविधि, उथला जल, खुले मैदान और पर्याप्त भोजन मिलने से यह क्षेत्र इनके लिए सुरक्षित प्रवास स्थल बन जाता है। 2024 में लूणकरणसर क्षेत्र वेटलैंड घोषित
लूणकरणसर में इंदिरा गांधी नहर के सीपेज का पानी पहले आफत माना जाता था, लेकिन आज इसी पानी से बनी झील टूरिस्ट पॉइंट बन गई है। 25 हजार से ज्यादा कुरजां (साइबेरियन क्रेन) यहां डेरा डाले हुए हैं। पक्षियों के कलरव और हल्की सर्द हवाओं के बीच लूणकरणसर का ये पॉइंट टूरिस्ट को पसंद आ रहा है। बीकानेर-श्रीगंगानगर मार्ग पर नेशनल हाईवे के पास बना वेटलैंड सैलानियों को भी पसंद आ रहा है। सुबह और शाम के समय दूर तक पक्षियों की सामूहिक उड़ान और कलरव को सैलानी कैमरे में कैद कर रहे हैं। वर्ष 2024 में लूणकरणसर क्षेत्र को वेटलैंड घोषित किए जाने के बाद इसका पर्यावरणीय और पर्यटन महत्व और बढ़ गया है। यहां अब विभिन्न राज्यों और देशों से आने वाले अन्य प्रवासी पक्षी भी देखे जा रहे हैं। कई प्रजातियां ऐसी हैं, जो सामान्य तौर पर अन्य स्थानों पर कम ही दिखाई देती हैं। प्रशासन इस वेटलैंड को रामसर साइट का दर्जा दिलाने के प्रयास भी कर रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी पहचान और संरक्षण सुनिश्चित हो सके। जोधपुर, चूरू और भरतपुर से ज्यादा बीकानेर आए
कुरजां जोधपुर संभाग के कई तालाबों और जलाशयों के आसपास देखे जा सकते हैं। चूरू का ताल छापर अभयारण्य और भरतपुर का केवलादेव घना पक्षी विहार इनके प्रमुख ठिकानों में शामिल रहा है। फलोदी और खीचन क्षेत्र कुरजां की बड़ी संख्या के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। हालांकि अब इन इलाकों में इनकी संख्या में गिरावट आई है, जबकि बीकानेर के लूणकरणसर में जबरदस्त बढ़ोतरी रिकॉर्ड हुई है। राजस्थान की लोक संस्कृति में कुरजां पर लिखे गए गीत
राजस्थान की लोकसंस्कृति में कुरजां केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि भावनाओं के संवाहक माने जाते हैं। लोक काव्य में विरहिणी पत्नी अपने प्रिय तक संदेश पहुंचाने के लिए कुरजां से गुहार लगाती है- कुरजां थे आकाश में, कित जावो की काम, इण घर रो संदेसड़ों, पहुंचावण उण धाम। लोकप्रिय लोकगीत “कुरजां ए म्हारो भंवर मिला देनी ए…” में भी कुरजां को बहन मानते हुए मन का संदेश प्रियतम तक पहुंचाने का जिक्र किया गया है। अब पाकिस्तान-अफगानिस्तान में कम रुकते हैं
साहित्यकार और कुरजां पर रिसर्च कर रहे राजूराम बिजारणियां का कहना है कि साइबेरिया से पाकिस्तान और अफगानिस्तान के रास्ते कुरजां भारत आते हैं। लेकिन इन दोनों ही देशों में इनका शिकार होने के कारण ये इन दोनों देशों में अब कम ठहरते हैं। ये जल्द से जल्द भारत की सीमा में प्रवेश करते हैं, जहां इन्हें अनुकूल माहौल और भरपूर भोजन मिलता है। झील का नमकीन पानी आया पसंद
बिजारणियां बताते हैं- लूणकरणसर झील में पानी नमकीन (खारा) है, जो कुरजां को टेस्टी लगता है। इस पानी के कारण भी ये पक्षी अब यहां स्थायी रूप से आने लगे हैं। यहां पर प्रजनन करते हैं और इसके बाद वापस अपने ठंडे प्रदेशों में पहुंच जाते हैं। इन महीनों में कजाकिस्तान, मंगोलिया में बर्फ जमने लगती है। ऐसे में वहां प्रजनन संभव नहीं हो पाता। खीचन में भीड़ बढ़ने का दबाव
खीचन (फलोदी) में कुरजां की संख्या अब कैरिंग कैपेसिटी से ज्यादा होने लगी है। नतीजा ये है कि कुरजां आसपास के नए सुरक्षित इलाकों की तलाश में बीकानेर की ओर शिफ्ट हुए हैं। खीचन में कुरजां को नियमित दाना डाला जाता है, प्रबंधन ज्यादा बेहतर है। पर्यटकों की संख्या ज्यादा होने लगी है। वहीं लूणकरणसर में कुरजां को प्राकृतिक भोजन मिलता है। लूणकरणसर में खीचन की तरह कुरजां के निवास के लिए बेहतर व्यवस्था नहीं है। हालांकि खीचन में सीमित क्षेत्र में ही कुरजां को रहना पड़ता है, लेकिन लूणकरणसर में बड़ा और खुला इलाका है। यही कारण है कि लूणकरणसर कुरजां हब बनता जा रहा है। कुरजां के लिए सुरक्षित वेटलैंड्स बने रेस्टिंग और फीडिंग साइट
लूणकरणसर, नाल, कोलायत और आसपास के इलाकों में सिंचाई परियोजनाएं, बरसाती पानी के ठहराव और खेतों में बनी डिग्गियों के कारण वेटलैंड्स बढ़े हैं, जो कुरजां के लिए खास रेस्टिंग और फीडिंग साइट बन गए हैं। कुछ ग्रामीण इलाकों में शिकार न के बराबर, बिजली तारों से दुर्घटनाएं कम, अपेक्षाकृत शांत वातावरण होने से ये यह कुरजां के लिए सुरक्षित जोन बन रहा है। रबी फसल, चारे की उपलब्धता और खेतों में बचा अनाज ही कुरजां के लिए पर्याप्त भोजन है। ——– विदेशी मेहमानों के राजस्थान पधारने की यह खबर भी पढ़िए… साइबेरियन पक्षियों के लिए घर को बनाया टूरिस्ट स्पॉट:3 हजार को बचाया, पेशे से मजदूर सेवाराम की पक्षी सेवा के किस्से अमेरिका तक पहुंचे खीचन (फलोदी) के 43 साल के सेवाराम। जैसा नाम, वैसा काम। पेशे से मजदूर सेवाराम 27 साल से पक्षियों की सेवा में जुटे हैं। इस दौरान 3 हजार कुरजां का रेस्क्यू किया। इनके प्रयासों से पक्षियों की राह में आने वाले बिजली के तार भी अंडरग्राउंड हो गए। पढ़ें पूरी खबर….


