राजस्थान में जापानी तकनीक के जंगल, यहां कॉम्पिटिशन करते हैं:खूंखार जानवरों के नया घर मिलेगा, बंजर जमीन में लगे हजारों पेड़, प्रयोग सफल

भरतपुर में मियावाकी तकनीक से मिनी जंगल विकसित किया जा रहा है। इसके लिए फिलहाल सवा बीघा जमीन पर 8 हजार पेड़ लगाए गए हैं। अगर ये प्रोजेक्ट सक्सेस हुआ तो आगे और जमीन लेकर बड़ा जंगल विकसित किया जा सकेगा। जिसे वन्य-जीवों और पक्षियों के रहने के अनुकूल बनाया जाएगा। इससे पहले दौसा में भी इसी तरह का 12 बीघा जंगल विकसित किया जा चुका है। जंगली जानवरों के साथ हो रहे हादसों के बाद इस तकनीक से उन्हें बसाने की कोशिश की गई है। बाण गंगा के सूखने के बाद से ये भरतपुर के आमोली इलाके की 256 बीघा जमीन बंजर पड़ी थी। इसके लिए 2 साल पहले मियावाकी फारेस्ट बनाने का प्लान शुरू किया। पढ़िए कैसे बसेगा ये जंगल और क्या है मियावाकी तकनीक क्यों बसाने पड़ रहे जंगल क्यूब हाईवे कंपनी के नेशनल हाईवे 21 के जयपुर से महुआ और महुआ से भरतपुर सेक्शन के प्रोजेक्ट हेड महेंद्र पाल ने बताया- भरतपुर जिले के आमोली इलाके में 25 साल पहले बाणगंगा नदी बहती थी। XXX साल में पांचना बांध बनने के बाद बाणगंगा नदी पूरी तरह से सूख गई। इसके बाद इलाके की 236 बीघा जमीन बंजर हो गई। अब इसी जमीन को उपजाऊ बनाने के लिए जंगल बनाए जा रहे हैं। जंगल बनाने के लिए मियावाकी तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है। यह एक जापानी टेक्निक है। इससे वातावरण तो शुद्ध होगा ही साथ ही जानवर और पक्षियों के लिए भी आसरा मिलेगा। वैर ग्राम पंचायत से सिर्फ सवा बीघा जमीन मिली है। इसलिए सवा बीघा जमीन पर मियावाकी जंगल तैयार किया गया है। अगर और जमीन मिलती है तो, उस पर भी जंगल तैयार किया जाएगा। अभी सवा बीघा में 8 हजार पेड़ महेंद्र पाल ने बताया- मियावाकी प्लांटेशन हमारी कंपनी द्वारा किया गया था। यहां पर सवा बीघा जमीन पर करीब 8 हजार पेड़ लगाए गए। लगाने के बाद हमारी कंपनी ही उनकी देखरेख की जा रही है। यह पेड़ मियावाकी तकनीक से लगाए जा रहे हैं। यह जापान की तकनीक है। करीब 1 स्क्वायर मीटर में 4 पेड़ लगाए जाते हैं। और जमीन मिलेगी तो जंगल का दायरा बढ़ाएंगे महेंद्र पाल ने बताया- यह एक जंगल डेवलप करने का आइडिया है। इस तकनीक से अलग-अलग किस्म के पेड़ लगाए जाते हैं। जिसमें फलदार और फूलदार पेड़ रहते हैं। यह पेड़ ऑक्सीजन ज्यादा देते हैं। जैसे गूलर का पेड़ है उससे लगने वाला फूल और बीज पक्षियों का भोजन होता है। आगे हमें और भी जमीन मिलेगी तो, और भी इसी तरह के जंगल लगाए जाएंगे। हाईवे के दोनों तरफ कंपनी द्वारा पेड़ लगाए जाते हैं। इसके अलावा ग्रीनरी को बढ़ावा देने के लिए यह कदम उठाया गया है। दौसा में बना चुके 12 बीघा का जंगल महेंद्र पाल ने बताया- भरतपुर के अलावा दौसा करीब 12 बीघा जमीन में भी इसी तरह का जंगल बनाया गया है। जहां 60 से 70 हजार पेड़ लगाए गए हैं। वह काफी अच्छी ग्रोथ भी कर गया है। जंगल को बढ़ाने के लिए खाद दवा समय-समय पर दी जाती है। साथ रख रखाव के लिए लोग भी लगाए जाते हैं। मियावाकी तकनीक को सरकार भी दे रही बढ़ावा महेंद्र पाल ने बताया- मियावाकी तकनीक को भारत सरकार ने ही बढ़ावा दिया है। क्योंकि इस तकनीक से काफी हरियाली होती है। 2 साल पहले हमें इस तकनीक का पता लगा है। भारत सरकार और राज्य सरकार द्वारा तकनीक को काफी बढ़ावा दिया गया है। साथ ही सरकारी कार्यक्रमों में भी इस तकनीक के बारे में बताया जाता है। हमें जब इस तकनीक का पता लगा तो, हमने इस तकनीक को आगे बढ़ाने का काम किया। पेड़ एक दूसरे की बढ़ने में करते हैं मदद महेंद्र पाल ने बताया- मियावाकी तकनीक से पेड़ लगाने से पेड़ जल्दी बढ़ते हैं। क्योंकि पेड़ पास-पास लगाए जाते हैं। जिससे एक पेड़ दूसरे पेड़ की बढ़ने में मदद करता है। दोनों सभी पेड़ों में जल्दी बढ़ने का कंपटीशन रहता है। हमारा उद्देश्य है कि जंगल से जो भी फायदे मिलते हैं उस तरीके के फायदे हमें मिलें। सिर्फ 2 साल करना होता है रखरखाव महेंद्र पाल ने बताया- 2 साल में पेड़ इतना बड़ा हो जाता है कि वह खुद बढ़ने लगता है। उसके रखरखाव की ज्यादा जरूरत नहीं होती। इसलिए 2 साल पेड़ों का पूरी तरह से ध्यान रखा जाता है। ज्यादातर उत्तर प्रदेश से पेड़ों को खरीदा जाता है। यह ध्यान रखा जाता है हेल्थी पेड़ हमें मिले। जिससे पेड़ ज्यादा से जायदा ग्रोथ हो। इसके लिए पहले यह पता किया जाता है की पेड़ अच्छे कहां से मिलेंगे। उसके बाद उन्हें खरीदा जाता है। जंगलों में रुकेंगे जानवर महेंद्र पाल ने बताया- जानवर खाने की तलाश में जगह जगह घूमते हैं। खाने की तलाश में जानवर हाईवे तक भी आ जाते हैं। अगर इस तरह के छोटे-छोटे जंगल बनाये जाएंगे तो, जानवरों को खाने के लिए घास, पेड़ों के पत्ते वहीं मिल सकेंगे। जिससे जानवरों को खाने की तलाश में इधर-उधर नहीं भटकना पड़ेगा। इससे हादसों में भी कमी आएगी। फूलदार और फलदार पेड़ लगाए गए हैं महेंद्र पाल ने बताया- आमोली स्थित सवा बीघा जमीन में जो मियावाकी जंगल तैयार किया गया है। उसमे करीब 20 किस्म के पेड़ लगाए गए हैं। वह सभी पेड़ फलदार और फूलदार हैं। जिसमें गूलर, वेर, आंवला और फूलदार पेड़ों में गुलमोहर, गुलाब की वैराइटी, चंपा के पेड़ लगाए गए हैं। यह पेड़ पशु पक्षी और जानवरों को आकर्षित करते हैं।

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