‘मेरे पति की आदतें खराब हैं, गीला तौलिया बेड पर फेंककर कहता है- मैं तो बचपन से यही करता आया हूं, ऐसे ही करूंगा।’ ‘मेरे पति को रोज लंच-डिनर में दाल-चावल और गुलाब जामुन चाहिए, खुद के लिए चाय तक नहीं बना सकते।’ ‘मेरी सास अपनी बेटी से मिलने कनाडा गई, दिन में 5 बार फोन करके यही सवाल करती- चिंटू का लंच पैक कर दिया, चिंटू लेट तो नहीं हो गया, चिंटू ने खाना खाया।’ पतियों का ऐसा व्यवहार राजस्थान में बढ़ते तलाक के मामलों की बड़ी वजह बन गया है। पत्नियां ऐसी शिकायतें लेकर कोर्ट और थाने तक पहुंच रही हैं। मनोचिकित्सक इस व्यवहार को ‘राजा बेटा सिंड्रोम’ कह रहे हैं। राजस्थान महिला आयोग के पास ऐसे कई मामले पहुंच रहे हैं। काउंसलिंग के दौरान पता चलता है कि पति के ‘राजा बेटा’ वाले व्यवहार के कारण महिलाएं तलाक की याचिका दायर कर रही हैं। अकेले जयपुर की 5 फैमिली कोर्ट में पिछले 10 साल में तलाक के मामले 3 गुना बढ़ गए हैं। संडे बिग स्टोरी में पढ़िए- आखिर ये ‘राजा बेटा सिंड्रोम’ क्या है, जिससे टूट रही है रिश्तों की डोर? केस-1 : पति की लंच-डिनर में डिमांड दाल-चावल के साथ मीठा भी हो
दौसा की पूनम (बदला हुआ नाम) एक प्राइवेट कॉलेज में प्रोफेसर हैं। पूनम सुबह कॉलेज के लिए निकलने से पहले घर का सारा काम निपटाती हैं। उसके बाद शाम को कॉलेज से आते वक्त सब्जियां खरीदने से लेकर घर की हर छोटी बड़ी जरूरत के सामान को खरीदना भी उसी की जिम्मेदारी है। कॉलेज से आने में लेट होने के बावजूद भी पति के लिए चाय उसी को बनानी होती है। पति को खाने में फिक्स चीजों की आदत है। इनमें से एक भी चीज कम होने पर पति का गुस्सा झेलना पड़ता है। पूरा खाना उनके हिसाब से ही बनाना पड़ता है। पूनम ने बताया कि मेरे पति का व्यवहार कभी-कभी बहुत निराशाजनक होता है, वह मुझे हमेशा यह महसूस कराते हैं कि उनकी जरूरतें सबसे महत्वपूर्ण हैं। मुझे उनके लिए हमेशा उपलब्ध रहना चाहिए, चाहे मेरी अपनी जरूरतें कितनी भी हों। यह स्थिति मुझे मानसिक रूप से थका देती है।’ इन सब से न सिर्फ मेरी मेंटल हेल्थ पर असर पड़ रहा बल्कि मेरी तबीयत भी खराब रहने लगी। पूनम ने बताया कि सास-ससुर गांव में रहते हैं, उन्हें कई बार यह सब बताया, लेकिन उन्होंने हमेशा यही कहते हुए टाल दिया कि पति का ध्यान रखना तो पत्नी का ही फर्ज है। इन सबसे हमारे झगड़े इतने बढ़ गए कि मैं तलाक का विचार कर चुकी थी। फिर महिला आयोग की शरण लेनी पड़ी। केस-2 : पति को गीला तौलिया बेड पर रखने से टोका, तलाक तक पहुंची बात
जयपुर के आर्यन (बदला हुआ नाम) और प्रिया (बदला हुआ नाम) की शादी को अभी दो ही साल हुए थे कि स्थिति तलाक तक पहुंच गई। प्रिया और आर्यन दोनों ही जयपुर से हैं और अलग-अलग प्राइवेट कंपनी में इंजीनियर हैं। आर्यन बचपन से ही एक ऐसे परिवार में पला-बढ़ा था, जहां उसकी हर गलती को नजरअंदाज किया गया। शादी के बाद, जब प्रिया ने उसे गीला तौलिया बैड पर रखने पर टोका, तो वह बुरी तरह नाराज हो गया। बोला- हमारे घर में ये सब नहीं चलता है। मुझे टोको मत। प्रिया कहती हैं, ‘उनकी आदत है कि बहस होने पर या तो गुस्सा करते या कई दिन तक बात बंद कर देते। उनको किसी बात पर अगर सलाह दी जाए तो उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं आती। हम समस्याओं पर कभी खुलकर बात नहीं कर पाए। इन्ही आदतों के कारण दो साल में सिर्फ दो महीने ही पति के साथ रही। उस बीच भी विवाद बहुत ज्यादा बढ़ गया। मैं मायके रहने चली गई थी। लेकिन कुछ समय बाद ही फिर रिश्तेदारों और परिवार के कहने पर ससुराल आ गई। इसके बाद भी कुछ नहीं बदला। आर्यन ने उसका सामान कमरे से बाहर फेंक दिया, क्योंकि उसे कबर्ड शेयर करना पसंद नहीं था। मां भी बेटे आर्यन का ही साथ देती। कहती कि- इकलौता बेटा है, इसलिए इसको राजकुमारों की तरह पाला है। नवंबर में हुई इस कहासुनी की बाद आर्यन प्रिया को ससुराल में छोड़कर अपनी बहन के पास रहने चला गया। प्रिया कहती है वो बच्चों की तरह जिद करता है। मैं अब भी साथ रहना चाहती हूं लेकिन उसकी मां और वो ये नहीं चाहते। मामला अब तलाक तक पहुंच गया है। दोनों की तरफ से तलाक की अर्जी लगा दी गई है। केस-3 : राजा बेटा सिंड्रोम ने डाली रिश्ते में दरार
जयपुर में रहने वाली कृतिका (बदला हुआ नाम) जोधपुर की हैं और एमबीए की पढ़ाई की हुई है। कृतिका की शादी तीन साल पहले जोधपुर के ही रहने वाले अनुज से हुई। अनुज एक बिजनेसमैन हैं, उसका टूर एंड ट्रेवल्स का काम है। अनुज एक खुशमिजाज इंसान था, लेकिन उसकी एक आदत ने रिश्ते में दरार डाल दी। वह अपने घर में कभी कोई जिम्मेदारी नहीं उठाता था। शादी के बाद भी उसने यही रवैया अपनाया। कृतिका कहती हैं, ‘सुबह से रात तक मैं अकेले सब संभालती हूं। अनुज बस ऑफिस जाते हैं और बाकी वक्त टीवी देखते हैं। एक दिन, जब मैं बीमार पड़ी, तो घर पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया। इस घटना ने मुझे एहसास दिलाया कि अनुज जिम्मेदारी उठाने में असमर्थ है। दरअसल, अनुज को लगता है कि घर की पूरी जिम्मेदारी सिर्फ कृतिका की है क्योंकि बचपन से अनुज की जिम्मेदारी उसकी मां ने ही उठाई। ऐसे में अब ये मेरा का फर्ज बनता है कि वो अनुज का हर काम करे और उसकी जिम्मेदारी उठाए। अनुज की इन आदतों ने मुझको इतना मानसिक परेशान किया कि मुझे मनोचिकित्सक की मदद लेनी पड़ी। क्या है राजा बेटा सिंड्रोम?
‘राजा बेटा सिंड्रोम’ एक ऐसी मानसिकता और व्यवहार है, जो बचपन में माता-पिता द्वारा संतान के अत्यधिक लाड़-प्यार और अनुशासनहीन पालन-पोषण से विकसित होती है। राजा बेटा सिंड्रोम में लड़कों को इतनी इम्पोर्टेंस दी जाती है कि वो हमेशा खुद को ही प्रायोरिटी पर रखता है। बचपन से लड़कों को परिवार में ‘राजा’ की तरह रखा जाता है, जहां उनकी हर जरूरत, हर इच्छा पूरी की जाती है। उन्हें किसी प्रकार की जिम्मेदारी उठाने या कठिनाइयों का सामना करने की शिक्षा नहीं दी जाती। मनोचिकित्सक इस तरह के व्यवहार को ‘राजा बेटा सिंड्रोम’ कहकर पुकारते हैं। राजा बेटा सिंड्रोम बच्चों में एक डिसऑर्डर को जन्म दे सकता है : मनोचिकित्सक एसएमएस अस्पताल के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. सुनील शर्मा बताते हैं ‘राजा बेटा सिंड्रोम’ एक पेरेंटिंग स्टाइल है, जिसमें बच्चों को राजकुमार की तरह पालने की आदत बन जाती है। इस पेरेंटिंग स्टाइल के कारण बच्चे दूसरों पर निर्भर हो सकते हैं। उनके विकास में रुकावट आ सकती है। इससे बच्चों के स्किल्स डेवलप नहीं हो पाते और वे इमोशनल इंटेलिजेंस या सोशल रिलेशनशिप में भी समस्या महसूस कर सकते हैं। डॉ. सुनील के अनुसार, ‘बचपन में बच्चों को अत्यधिक लाड़-प्यार से पालने के कारण उनमें आत्म-निर्भरता, सहनशीलता और भावनात्मक परिपक्वता का विकास नहीं हो पाता। जब यही बच्चे बड़े होकर शादी करते हैं, तो अपने पार्टनर के साथ समानता और सहयोग का रिश्ता नहीं बना पाते।’ यह सिंड्रोम बच्चों में नार्सिसिस्टिक या डिपेंडेंट पर्सनैलिटी को जन्म दे सकता है, जिससे उनके भाई-बहनों के साथ भी रिश्ते खराब हो सकते हैं। खासकर जब बात फीमेल सिबलिंग की आती है, तो भेदभाव हो सकता है। यह पेरेंटिंग स्टाइल बच्चों के प्रोफेशनल और पर्सनल लाइफ में भी मुश्किलें पैदा कर सकता है। भविष्य में तलाक या घरेलू हिंसा के मामलों में भी बढ़ोतरी हो सकती है। इससे बचने के लिए पेरेंटिंग के सही टिप्स और काउंसलिंग की आवश्यकता है। जयपुर के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. अखिलेश जैन ने बताया कि जिन बच्चों की ज्यादा पैंपरिंग की जाती है बड़े होने के बाद उनमें जिम्मेदारी का बोध कम होता है। ऐसे में जब उनके ऊपर जिम्मेदारी आती है तो वह बचने की कोशिश करते हैं और दूसरों पर डालने की कोशिश करते हैं। यह एक वजह रहती है कि कपल्स में तकरार बढ़ती है। जयपुर की फैमिली कोर्ट में 10 साल में 3 गुना बढ़े तलाक के मामले जयपुर शहर में 5 फैमिली कोर्ट हैं, जहां पति व पत्नी के बीच तलाक व भरण पोषण केस लगातार बढ़ रहे हैं। पेंडेंसी का आंकड़ा 9000 के करीब पहुंच गया है। तलाक, भरण पोषण सहित हिन्दू विवाह अधिनियम के तहत लंबित केस 10 साल पहले 2014 में 2700 थे, जो 2023 के अंत तक बढ़कर 8500 तक पहुंच गए थे। वहीं 2024 में इनकी संख्या 8720 हो गई। तलाक लेने वालों में 60 फीसदी मामले नए जोड़ों के हैं। इनमें सबसे बड़ा कारण आपसी तालमेल की कमी होना सामने आया है। महिला आयोग में आ रहे ऐसे केस, कर रहे काउंसलिंग : रेहाना रियाज राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष रेहाना रियाज ने बताया- इस तरह के कई केस आते हैं, जहां महिलाएं ये शिकायत करती हैं कि उनके पति उन्हें बिल्कुल भी सहयोग नहीं करते हैं। कई लड़के यह मानते हैं कि वे घर का काम करने के लिए नहीं हैं, क्योंकि वे कमाई करते हैं। इनके लिए एक शब्द प्रचलन में है राजा बेटा सिंड्रोम। आयोग के पास ऐसे केसेस की संख्या सैकड़ों में है। शादी के रिश्ते में अगर पत्नी घर के काम करती है, तो पति को भी उसकी मदद करनी चाहिए, जैसे- सब्जी काटना या बच्चों की देखभाल करना। यह समानता घर के आर्थिक और घरेलू कामों में जरूरी है। पुरुषों को भी यह समझना चाहिए कि घर के कामों में दोनों पार्टनर्स का बराबरी से योगदान होना चाहिए। खासकर न्यूक्लियर फैमिली (एकाकी परिवार) में, जहां दोनों पति-पत्नी अलग रहते हैं, उन्हें एक-दूसरे का आर्थिक और घरेलू मोर्चे पर सहयोग करना चाहिए। महिला आयोग के पास मामलों की लंबी लिस्ट
राजस्थान राज्य महिला आयोग में 2022 से लेकर 12 जनवरी 2025 तक दहेज और हिंसा से जुड़े 12 हजार 203 मामले आए हैं। जिनमें सबसे ज्यादा मामले दहेज से संबंधित क्रूरता और हिंसा के हैं। दहेज से संबंधित कुल 1192 मामले आए, वहीं हिंसा के 8791 मामले आए हैं। पुरुष रोजाना औसतन सिर्फ 19 मिनट ही घर के काम करने में लगाते हैं ‘राजा बेटा सिंड्रोम’ को समझा जाए तो उस स्थिति में मां को अपने बेटे में कभी न तो कोई गलती नजर आती है और न ही कोई बुराई दिखाई देती है। उन्हें हमेशा यही लगता है कि उनका बेटा कभी कोई गलत काम कर ही नहीं सकता है। इसी के साथ अधिकांश भारतीय मां अपने बेटों को खाना बनाना या घर आए मेहमानों का स्वागत करना तक नहीं सिखाती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है ये लड़कों का काम नहीं होता है। साल 2014 की अटलांटिक रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं की तुलना में भारतीय पुरुष घर का काम करने में सबसे कम समय बिताते हैं। पुरुष रोजाना औसतन सिर्फ 19 मिनट ही घर के काम करने में लगाते हैं। हालांकि जिसके बाद वो घर की महिलाओं की मदद करके खुद पर गर्व भी महसूस करते हैं। वहीं, हाल ही में भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) अहमदाबाद के एक प्रोफेसर द्वारा किए गए एक रिसर्च के अनुसार, 15 से 60 वर्ष की कामकाजी आयु वर्ग की महिलाएं बिना वेतन लिए घरेलू काम पर पुरुषों द्वारा 2.8 घंटे खर्च करने की तुलना में 7.2 घंटे बिताती हैं। इतना ही नहीं टाइम यूज सर्वे पर आधारित रिसर्च में कहा गया है कि मजदूरी कर कमाने वाली महिलाएं घर की सफाई, भोजन तैयार करने और देखभाल करने जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में मजदूरी कर कमाने वाले पुरुषों की तुलना में घरेलू काम पर दोगुना समय खर्च करती हैं। ….. राजस्थान में तलाक से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… पत्नी कमाती है तो भी गुजारा भत्ता की हकदार:बिजनेसमैन की वाइफ सरकारी टीचर, जोधपुर कोर्ट का आदेश- हर महीने 2 लाख देने होंगे पत्नी कमाती है तो भी वह गुजारा भत्ता पाने की हकदार है। एक केस में जोधपुर फैमिली कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है। जज दलपत सिंह राजपुरोहित ने पति के स्टेटस और आय के आधार पर यह फैसला सुनाया। पूरी खबर पढ़िए…


