राजा परीक्षित को ज्ञान प्राप्ति की कथा सुनाई:पंडित धीरज महाराज ने आत्मा की अमरता का मार्ग बताया

हाउसिंग बोर्ड में चल रही सप्त दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का समापन राजा परीक्षित को ज्ञान प्राप्ति के साथ हुआ। इस कथा के माध्यम से शुकदेव मुनि ने राजा परीक्षित को सात दिनों तक ज्ञान प्रदान किया, जिससे उनका मृत्यु भय समाप्त हो गया और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। राजा परीक्षित ने शुकदेव मुनि से कहा कि सात दिन की कथा सुनने, समझने और उसका अभ्यास करने के प्रताप से वे ब्रह्म में प्रविष्ट हो गए हैं। उन्हें अब किसी का भी भय नहीं है और मुनि की कृपा से उनका अज्ञान समाप्त हो गया है। पंडित धीरज महाराज ने कथा के समापन पर कहा कि यह कथा आत्मा की अमरता और परमात्मा से मिलन का मार्ग सिखाती है। इसी कथा ने राजा परीक्षित को सांसारिक आसक्तियों से मुक्ति दिलाई और उन्हें परम शांति प्रदान की। उन्होंने जोर दिया कि कथा सुनने से ही मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है, जो हर मनुष्य के लिए प्रासंगिक है। महाराज ने आगे कहा कि 84 लाख योनियों में केवल मनुष्य ही भोग-प्रमाद में लगा रहता है। वह दिन-रात सिर्फ पैसा कमाने के बारे लिए सोचता रहता है और उसके पास भक्ति या ईश्वर के लिए समय नहीं होता। महाराज ने समझाया कि श्री भगवान हमारे माता-पिता के समान हैं। वे योग अर्थात् अच्छी वस्तुएं, स्थान और परिस्थितियां प्रदान करते हैं, जो हमारे लिए हितकर और उन्नतिदायक हैं। क्षेम का अर्थ है सुख, समृद्धि और आरोग्य का बना रहना, जिसकी व्यवस्था ईश्वर स्वयं करते हैं। जब सारी व्यवस्था ईश्वर ने हमारे लिए तय कर रखी है, तो हमें इस जीवन का सदुपयोग करना चाहिए। उन्होंने जगत कल्याण के लिए प्रभु के विभिन्न अवतारों का जिक्र करते हुए कहा कि श्रीमद्भागवत एक कल्पवृक्ष के समान है, जिसके आश्रय में जीवन का कल्याण निश्चित है। उन्होंने सुदामा चरित्र के प्रसंग को बताते हुए कहा कि मित्रता कैसे निभाई जाए यह भगवान श्री कृष्ण से समझ सकते हैं। मित्रता करो तो भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा जैसी करो। सच्चा मित्र वही है, जो अपने मित्र की परेशानी को समझे और बिना बताए ही मदद कर दे। परंतु आजकल स्वार्थ की मित्रता रह गई है। जब तक स्वार्थ सिद्ध नहीं होता है, तब तक मित्रता रहती है। उन्होंने उद्धव और गोपी संवाद, श्रीमद्भागवत का एक मार्मिक प्रसंग है, जहां ज्ञानी उद्धव कृष्ण का निर्गुण ज्ञान लेकर ब्रज आते हैं, लेकिन गोपियां अपने सगुण प्रेम और भक्ति से उन्हें निरुत्तर कर देती हैं यह सिखाते हुए कि भक्ति ही सर्वोच्च है और ज्ञान से बढ़कर प्रेम है, जिससे उद्धव स्वयं ब्रज की धूल बनना चाहते हैं। समापन के दिन मंगलवार को कथा सुनने भारी भीड़ उमड़ी।

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