अंतर्राष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय के जन्मदाता रामचरण महाराज की 306वीं जयंती प्रतापगढ़ स्थित रामद्वारा में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई गई। इस अवसर पर सुबह से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु रामद्वारा पहुंचकर महाप्रभु की पूजन-अर्चना में लीन रहे। यह आध्यात्मिक क्रम दिनभर जारी रहा। महोत्सव के तहत नगरपरिषद सूरजपोल से भव्य शोभायात्रा का शुभारंभ हुआ। बैंड-बाजे, छत्र-चंवर, घोड़े और शाही लवाजमे के साथ महाप्रभु द्वारा रचित पूज्य वाणी जी ग्रंथ का नगर भ्रमण कराया गया। शोभायात्रा में रामस्नेही अनुयायी पारंपरिक वेशभूषा में भजन गाते हुए चल रहे थे। वहीं, महिलाओं ने ढोल की थाप पर गरबा नृत्य कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया। शोभायात्रा के दौरान संत हरशूखराम ताल और संत सेवाराम महाराज भक्तों को आशीर्वाद देते हुए अग्रिम पंक्ति में चल रहे थे। महाप्रभु के स्वरूप की भव्य झांकी नगरवासियों के लिए आकर्षण का केंद्र रही। नगर में विभिन्न स्थानों पर श्रद्धालुओं, नगर परिषद और धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं द्वारा शोभायात्रा का स्वागत किया गया, संतों का अभिनंदन हुआ और वाणी ग्रंथ की पूजन-अर्चना की गई। रामद्वारा पहुंचने पर शोभायात्रा में शामिल सभी भक्तों का आत्मीय स्वागत किया गया। प्रवचन माला में शम्भुराम महाराज ने महाप्रभु के जीवन चरित्र का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि जहां संत प्रकट होते हैं, वो स्थान तीर्थ के समान पवित्र हो जाता है। महाराज ने बताया कि संतों द्वारा बताए गए मार्ग पर चलकर मानव अपने जीवन से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसी बुराइयों को त्याग सकता है। उन्होंने सत्संग और धार्मिक आयोजनों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रभु नाम जप से ही जीव का सच्चा कल्याण संभव है। संत ने उदाहरण देते हुए समझाया कि जैसे अग्नि का गुण जलाना है, चाहे उसे जानकर छूएं या अनजाने में, और पारस का स्वभाव लोहे को सोना बनाना है, उसी प्रकार प्रभु भक्ति का फल जीव को अवश्य प्राप्त होता है, चाहे वह जानकर करे या अनजाने में। संध्या समय महाआरती का आयोजन हुआ, जिसके बाद विशाल भंडारे का आयोजन किया गया, जो देर रात तक जारी रहा।


