संशोधित पीकेसी (रामजल सेतु) प्रोजेक्ट से राजस्थान के 17 जिलों को पेयजल, सिंचाई व उद्योग के लिए 3310 एमसीएम (331 करोड़ क्यूबिक मीटर) पानी मिलेगा। वहीं, पूर्व के ईआरसीपी प्रोजेक्ट से 3510 एमसीएम पानी मिलना था। पीकेसी से मध्यप्रदेश को 3100 एमसीएम पानी मिलेगा। यह खुलासा जल संसाधन विभाग द्वारा पहली बार सार्वजनिक किए गए राजस्थान, मध्यप्रदेश व केंद्र सरकार के बीच 5 दिसंबर 2024 को हुए समझौते (एमओए) से हुआ है। अब प्रोजेक्ट की डीपीआर दोनों राज्य व राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण मिलकर बना रहे हैं। डीपीआर में लागत तय होने के बाद केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में खर्च का अनुपात तय होगा। प्रोजेक्ट में संचालन समिति बनेगी, जो नीतियों, प्रगति, वित्त पोषण व अन्य मामलों की समीक्षा करेगी। वहीं, संचालन समिति स्तर पर विवाद होने पर उच्च स्तरीय समिति तक मामला जाएगा। वित्तीय चरणबद्धता, निगरानी व गुणवत्ता नियंत्रण के लिए निगरानी प्रकोष्ठ बनेगा। दावा : डूंगरी बांध में 270 एमसीएम पानी आपात स्थिति के लिए स्टोर रहेगा दूसरी ओर जल संसाधन विभाग का दावा है कि पीकेसी प्रोजेक्ट से प्रदेश को 3580 एमसीएम पानी मिलेगा। इसमें 3310 एमसीएम का उपयोग हो सकेगा। जबकि, 270 एमसीएम पानी का बैंकिंग स्टोरेज डूंगरी बांध में रहेगा, ताकि मानसून कमजोर होने पर इसे संकट में उपयोग किया जा सके। विभाग का एक दावा यह भी है कि प्रदेश को 4102.60 एमसीएम पानी मिलेगा, जिसमें 522.80 एमसीएम पुन: चक्रित शामिल है। ऐसे होगा जल का बंटवारा प्रोजेक्ट में दोनों राज्य चंबल के हर उप-बेसिन, कालीसिंध उप बेसिन, सहायक नदियों में 50%, कुनो व पार्वती उप-बेसिन में 75% निर्भरता तक जल दोहन कर सकेंगे। राजस्थान व मध्यप्रदेश में पानी के बंटवारे के समझौतों के अनुसार वॉटर ऑडिट व किसे कितना पानी मिलेगा, इसके लिए अलग निकाय बनेगा। यह दोनों राज्यों के बीच पानी का रेगुलेशन करेगा। प्रदेश में यह काम होंगे यह है रामजल सेतु प्रोजेक्ट मानसून में चंबल नदी के सहायक नदी बेसिनों (कुन्नू, कूल, पार्वती, कालीसिंध, मेज) से अधिशेष वर्षाजल बहकर समुद्र में चला जाता है। इस पानी को बनास, मोरेल, बाणगंगा, पार्बती, कालीसिंध, गंभीर आदि में भेजा जाएगा। इससे बाढ़ प्रबंधन के साथ राज्य के सूखाग्रस्त क्षेत्र में पेयजल, सिंचाई व उद्योगों के लिए पानी मिलेगा। 2017 में भी ईआरसीपी की डीपीआर केंद्र को भेजी गई थी।


