राजस्थान में बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा के लिए सरकारी स्कूलों पर अभिभावकों का भरोसा लगातार घटता जा रहा है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा 2025 के सर्वे के मुताबिक, प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में प्री-प्राइमरी स्तर पर सरकारी स्कूलों में सिर्फ 5.7 फीसदी बच्चे दाखिला ले रहे हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा 55.5 फीसदी है। प्रदेश स्तर पर यह संख्या 41.4 फीसदी है, जो राष्ट्रीय औसत 52.6 फीसदी से कम होने के साथ अन्य राज्यों की तुलना में भी बेहद कम है। सर्वे में यह भी सामने आया कि प्री-प्राइमरी में दाखिले को लेकर अभिभावक लड़के और लड़कियों के बीच भेदभाव कर रहे हैं। सरकारी प्री-प्राइमरी स्कूलों में प्रदेश स्तर पर लड़कियां 5 और ग्रामीण स्तर पर 8 फीसदी अधिक हैं। यह आंकड़ा रूढ़िवादी सोच का नतीजा है, जिसमें लड़कों की शुरुआती पढ़ाई के लिए अभिभावक निजी स्कूलों को प्राथमिकता देते हैं, जबकि लड़कियों को सरकारी स्कूल में पढ़ाते हैं। इस कारण निजी स्कूलों में लड़के 59.8, जबकि लड़कियां 52.5 फीसदी हैं। ग्रामीण में 17वें स्थान पर प्रदेश प्री-प्राइमरी स्तर पर ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों में बच्चों के दाखिले में राजस्थान देश में 17वें स्थान पर है। 55.5 फीसदी बच्चे सरकारी स्कूलों में हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 65.6 फीसदी है। गुजरात 84.7 फीसदी और मध्य प्रदेश 68.9 फीसदी के साथ हमसे आगे हैं। शहरों के हिसाब से राजस्थान देश के आखिरी तीन राज्यों में है। बच्चों के सरकारी स्कूलों में दाखिले के हिसाब से मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश हमसे आगे हैं। सरकार बेहतर सुविधा दे तो आम आदमी पर बोझ घटेगा प्रदेश में सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था के लिए भी ये आंकड़े चेतावनी हैं। सरकार बेहतर सुविधाएं दे और अभिभावकों का भरोसा जीते तो आम आदमी पर बच्चों की शिक्षा का बोझ कम हो सकता है। राज्य सरकार को शिक्षा नीति पर विचार करने की जरूरत है, क्योंकि जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर जैसे शहरों में पिछले एक दशक में निजी स्कूल चेन का विस्तार हुआ है। जबकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में सरकारी स्कूलों में बाल वाटिकाओं की स्थापना का सुझाव दिया गया है। प्राइवेट स्कूलों में एयर-कंडीशन्ड क्लासरूम, स्मार्ट बोर्ड, स्विमिंग पूल और अन्य आधुनिक सुविधाएं अभिभावकों को आकर्षित करती हैं। प्ले-ग्रुप, नर्सरी और केजी के लिए लगातार प्रचार किया जाता है।


