कांग्रेस अब संगठन को नए तरीके से मजबूत करने की रणनीति बना रही है। लगातार चुनावी हार के बाद पार्टी अब जिलास्तर तक अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रही है। इसी कड़ी में राहुल गांधी पहली बार देशभर के जिलाध्यक्षों से सीधे संवाद करने जा रहे हैं। दिलचस्प ये है कि इस बैठक से पहले छत्तीसगढ़ में 11 जिलाध्यक्ष बदले जा चुके हैं। सवाल यह है कि यह सिर्फ संगठन को मजबूत करने की कोशिश है या राहुल गांधी हाईकमान मॉडल को फिर से प्रभावी करने जा रहे हैं? राहुल गांधी की रणनीति क्या है? राहुल गांधी 27, 28 मार्च और 3 अप्रैल को देशभर के जिलाध्यक्षों से मुलाकात करेंगे और पार्टी की आगामी रणनीतियों पर चर्चा करेंगे। 3 अप्रैल को छत्तीसगढ़ के जिलाध्यक्षों से संवाद तय किया गया है। हालांकि, PCC अध्यक्ष दीपक बैज का कहना है कि यह संभावित तारीख है और अंतिम रूप से अभी कुछ तय नहीं है। ग्राउंड लेवल पर कंट्रोल बनाने की कवायद इस बैठक को कांग्रेस के ग्राउंड लेवल पर रिपोर्ट इकट्ठा करने और संगठन को मजबूत करने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। इससे यह पता चलेगा कि बूथ स्तर पर कांग्रेस किन समस्याओं से जूझ रही है और किस तरह से जनता का भरोसा वापस जीता जा सकता है। लेकिन इस बैठक का असर सिर्फ इतना नहीं होगा। राहुल गांधी का जिलाध्यक्षों से सीधा संवाद प्रदेश नेतृत्व की भूमिका को कमजोर कर सकता है। अब तक जिलाध्यक्षों की रिपोर्ट प्रदेश अध्यक्ष के जरिए हाईकमान तक पहुंचती थी, लेकिन इस बैठक के बाद राहुल गांधी सीधे जिलाध्यक्षों से फीडबैक लेंगे, जिससे प्रदेश नेतृत्व और मुख्यमंत्री की भूमिका प्रभावित हो सकती है। सीधे संवाद से क्या बदलेगा? क्या ये संगठन सुधार और पावर कंट्रोल छत्तीसगढ़ में क्यों बदले गए 10 जिलाध्यक्ष? इस बदलाव से पहले छत्तीसगढ़ में 10 जिलाध्यक्ष बदले जा चुके हैं। पीसीसी अध्यक्ष दीपक बैज का कहना है कि जहां पार्टी कमजोर प्रदर्शन कर रही है, वहां यह प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी। हालांकि रायपुर और बिलासपुर को लेकर अभी तक कोई फैसला नहीं लिया गया है। सूत्रों का कहना है कि जिलाध्यक्षों के चयन में बड़े नेताओं की पसंद को ध्यान में रखा गया है ताकि गुटबाजी को रोका जा सके। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या राहुल गांधी की बैठक से पार्टी में गुटबाजी कम होगी या यह प्रदेश नेतृत्व और हाईकमान के बीच नई खींचतान का कारण बनेगी? क्या कांग्रेस में फिर लौट रहा है हाईकमान कल्चर? राहुल गांधी की यह बैठक सिर्फ संगठनात्मक सुधार नहीं, बल्कि कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति का नया समीकरण भी तय कर सकती है। हाईकमान का सीधा दखल बढ़ने से क्या प्रदेश नेतृत्व की ताकत कम होगी? क्या कांग्रेस में एक बार फिर हाईकमान कल्चर लौटेगा? इस बैठक से पार्टी के भीतर चल रही गुटबाजी को रोकने में कितनी मदद मिलेगी, यह देखना दिलचस्प होगा। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ संगठन मजबूत करने की रणनीति है या कांग्रेस की पुरानी सत्ता संरचना को फिर से स्थापित करने की कोशिश?


