झारखंड हाईकोर्ट में सोमवार को रिम्स से निकलने वाले बायो मेडिकल वेस्ट को सॉलिड वेस्ट के साथ मिलाकर फेंके जाने पर स्वतः संज्ञान से दर्ज मामले की सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने दैनिक भास्कर के एक सितंबर के अंक में ‘रिम्स का बायोवेस्ट बन गया सिरदर्द… सामान्य कचरे में मिला दे रहे हैं सफाईकर्मी, संक्रमण का मंडरा रहा खतरा’ शीर्षक से प्रकाशित समाचार पर स्वतः संज्ञान लिया है। मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने रिम्स से विस्तृत जवाब मांगा है। अदालत ने रिम्स प्रबंधन से पूछा है कि बायो मेडिकल वेस्ट का निस्तारण कैसे किया जा रहा है? इसके लिए जिम्मेदार कंपनी पर अब तक क्या कार्रवाई की गई है? इसका समाधान कैसे निकाला गया है? सुनवाई के दौरान रिम्स की ओर से अदालत को बताया गया कि बायो मेडिकल वेस्ट का निस्तारण करने वाली कंपनी से स्पष्टीकरण मांगा गया है। क्योंकि कंपनी ने अपना काम ठीक से नहीं किया। मेडिकल वेस्ट बाहर दिख रहा था। इस पर अदालत ने पूछा है कि किन परिस्थितियों में बायो मेडिकल वेस्ट को सामान्य कचरे में मिलाया गया और दोषियों के खिलाफ अब तक क्या कार्रवाई की गई है? अदालत ने मामले की अगली सुनवाई पांच नवंबर को निर्धारित की है। निगम कर्मियों की मिलीभगत से झिरी पहुंच रहा मेडिकल वेस्ट रांची के कई बड़े अस्पताल और नर्सिंग होम से निकलने वाले बायो मेडिकल वेस्ट को सामान्य मेडिकल वेस्ट के साथ मिलकर फेंका जाता है। नगर निगम के कर्मचारियों की मिलीभगत से यह कचरा झिरी में डंप किया जाता है। इसे लेकर हाईकोर्ट पूर्व में भी सख्त निर्देश दे चुका है। लेकिन इस पर अब तक रोक नहीं लगी। रिम्स में भी मेडिकल वेस्ट के निपटारे में बड़ी लापरवाही सामने आ रही है। अस्पतालों से निकलने वाले सीरिंज, निडिल, बोतल, कैप इत्यादि सामग्री के साथ कई बार सर्जरी की सामग्री व मांस के टुकड़े भी फेंके दिखते हैं।


