रेप केस में महाराष्ट्र के डॉक्टर को राहत नहीं:हाईकोर्ट ने FIR व चार्जशीट रद्द करने से किया इनकार, कहा- ट्रॉयल के दौरान रखें अपना पक्ष

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और रविंद्र अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने दुष्कर्म केस में महाराष्ट्र के डॉक्टर की याचिका को खारिज कर दिया है। डिवीजन बेंच ने आदेश पारित करते हुए एफआईआर, चार्जशीट और संज्ञान आदेश को रद्द करने से इंकार कर दिया है। महाराष्ट्र के लातूर जिले के रहने वाला विजय उमाकांत वाघमारे (33) एमएस ऑर्थोपेडिक सर्जन हैं। उनके खिलाफ भिलाई नगर, जिला दुर्ग में वर्ष 2018 में अपराध दर्ज किया गया था। आरोप है कि उन्होंने शादी करने का झांसा देकर युवती के साथ रेप किया था। जिसके बाद लगातार शारीरिक संबंध बनाते रहा। जांच के बाद 3 अक्टूबर 2025 को धारा 376 आईपीसी के तहत चार्जशीट पेश की गई, जिस पर न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, दुर्ग द्वारा संज्ञान ले लिया गया। इसी के खिलाफ आरोपी डॉक्टर ने बीएनएसएस की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर की। झूठे मामले में फंसाने का लगाया आरोप
याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट ने तर्क दिया कि डॉक्टर को झूठे मामले में फंसाया गया है। उन्होंने कहा कि कथित घटनाक्रम के समय याचिकाकर्ता पुणे के ससून जनरल अस्पताल में रेजिडेंट डॉक्टर के रूप में पदस्थ थे और अस्पताल की प्रमाणित उपस्थिति रजिस्टर से यह सिद्ध होता है कि वे लगातार ड्यूटी पर थे। दलील दी गई कि, मार्च 2017 में भिलाई जाने का आरोप असंभव है क्योंकि, उस दौरान वे पुणे में ड्यूटी पर थे। 12 अप्रैल 2017 को भी अस्पताल रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि वे ड्यूटी पर मौजूद थे। शिकायतकर्ता की मां द्वारा विवाह के लिए दबाव बनाया जा रहा था। 19 महीने की देरी से एफआईआर दर्ज की गई, जो संदेह पैदा करती है। कथित संबंध यदि माने भी जाएं तो वे सहमति से थे। राज्य शासन ने कहा- ट्रॉयल में रख सकता है पक्ष
मामले में राज्य शासन की ओर से पैनल लॉयर ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि, याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए सभी मुद्दे तथ्यात्मक विवाद हैं, जिनका निर्णय ट्रायल के दौरान ही हो सकता है। ड्यूटी पर होने का दावे, कॉल रिकॉर्ड, देरी का कारण, सहमति जैसे प्रश्न साक्ष्य के विषय हैं। रेप जैसे मामलों में देरी अपने आप में एफआईआर रद करने का आधार नहीं बन सकती। एफआईआर और चार्जशीट से संज्ञेय अपराध स्पष्ट रूप से बनता है। हाईकोर्ट ने कहा- मिनी ट्रॉयल नहीं हो सकता
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ मामलों का हवाला देते हुए कहा कि एफआईआर या चार्जशीट को रद्द करने की शक्ति अत्यंत सीमित और दुर्लभ मामलों में ही प्रयोग की जानी चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि, इस स्तर पर सबूतों की जांच या मिनी ट्रायल नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और कहा कि याचिकाकर्ता को ट्रायल कोर्ट में अपना बचाव प्रस्तुत करने का पूरा अवसर मिलेगा।

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