रेप को नॉर्मलाइज कर लिया है, फिल्म ही तय करेगी केस क्या और न्याय कैसे

आज समाज में रेप की घटनाएं इतनी बढ़ गई हैं कि कहीं न कहीं हम इन्हें ‘नॉर्मलाइज’ करने लगे हैं। हाल ही मैंने एक केस पढ़ा, जिसमें 6 साल की बच्ची के साथ रेप हुआ था। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह कि इस अपराध में 10, 11 और 13 साल बच्चे शामिल थे। यह हमें दिखाता है कि हम समाज के तौर पर कहीं न कहीं कुछ बहुत गलत कर रहे हैं। यह बात अभिनेत्री तापसी पन्नू ने अपनी अपकमिंग फिल्म ‘अस्सी’ के प्रमोशन के दौरान कही। उन्होंने कहा- यह फिल्म ‘किसने किया’ नहीं है, बल्कि ‘क्यूं किया’ पर फोकस करती है। इसमें दर्शकों को जज की कुर्सी पर बैठाया गया है। फिल्म देखने के बाद हर व्यक्ति खुद तय करेगा कि उसने इस केस को कैसे देखा और न्याय क्या है। यह िफल्म 20 फरवरी को रिलीज होगी। cb interview हेमकुंट फाउंडेशन से जुड़ी हैं, सोशल वर्क ने आपकी सोच को कैसे बदला? जब मैं कमाने लगी, तभी ट्रैवलिंग शुरू की। उस दौरान मुझे अहसास हुआ कि दुनिया की बड़ी तस्वीर में हम कितने छोटे हैं। आप कितने ही बड़े स्टार न बन जाएं, लेकिन जब आप दुनिया घूमते हैं तो समझ आता है कि असल में हम उतने बड़े नहीं हैं, जितना खुद को समझ लेते हैं। आपका स्किन केयर और कर्ली हेयर रूटीन के बारे में क्या कहना है? कर्ली हेयर रूटीन थोड़ा लंबा प्रोसेस है। जिनके कर्ली हेयर हैं उनको कहना चाहूंूगी कि इन्हें स्ट्रेट करना बंद कर दीजिए। मैं काफी डिसीप्लिंड लाइफ जीती हूं। टाइम पर सोना, उठना, थोड़ा वर्कआउट। यही अंदर से ठीक रखता है। फिल्म का कोई सीन जो कैमरा कट होने के बाद भी आपके दिमाग में चलता रहा? इसका आखिरी सीन, जब मैं कोर्ट में अपनी दलीलों का समेशन देती हूं। करीब डेढ़ पेज का डायलॉग था, जिसे सिंगल टेक में शूट किया। ओवरटाइम होने के बावजूद मेरे ऊपर प्रेशर था कि जल्दी और एक ही टेक में सीन पूरा करना है। यह लंबा सिंगल शॉट था, जिसकी शुरुआत में उस दिन दर्ज हुए 80 मामलों का जिक्र है। सोशल मीडिया पर कॉन्फिडेंट दिखती हैं, आपकी सबसे बड़ी इनसिक्योरिटी क्या है? मैं इनसिक्योर नहीं, नर्वस रहती हूं। काफी चीजों को लेकर स्ट्रेस में रहती हूं। एक एक्टर असुरक्षित न हो तो उसकी इंसानी साइड खत्म हो जाएगी और वो खत्म हो गई तो हम स्क्रीन पर क्या यूज करेंगे। फिल्म में आपका किरदार दिखने में आम है, उसकी लड़ाई गहरी है… क्या कहेंगी? इतनी दर्दनाक हकीकत है कि सोचते ही घुटन महसूस होती है। मेरे एक इंटरव्यू से दूसरे इंटरव्यू के बीच में ही कहीं न कहीं एक ऐसा केस हो जाता है। यानी 20 मिनट में एक घटना। यह कोई कहानी नहीं, हमारी रोजमर्रा की सच्चाई है। हम कहने लगे हैं ‘अब तो ऐसा होता ही है, क्या कर सकते हैं?’ लेकिन सवाल है कि कितनी बार हमने सच में इसे रोकने की कोशिश की?

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