लंदन की ब्रिटिश लायब्रेरी में छत्तीसगढ़ के रिकॉर्ड:1873 में पहली बार प्राचीन धरोहरों की हुई थी फोटाेग्राफी, आर्मेनिया के जेडी बेगलर ने खींची तस्वीरें

सिरपुर, सिताबेंगरा की गुफाएं, जांजगीर के प्रचीन कल्चूरी काल के मंदिरों को पहली बार अंग्रेज दुनिया के सामने लाने की कोशिश में रहे, पहली बार इन जगहों की फोटोग्राफी भी उसी दौर में हुई। इन तस्वीरों को लंदन की ब्रिटिश लायब्रेरी के रिकॉर्ड्स में रखा गया है। मगर अब रायपुर के लोग भी ये तस्वीरें देख सकते हैं। बीते जमाने की उन तस्वीरों के साथ एक फाेटो एग्जीबिशन शुरू किया गया है। 18 अप्रैल विश्व धरोहर दिवस के दिन संस्कृति विभाग ने महंतघासीदास म्यूजियम कैंपस में ये एग्जीबिशन लगाई है। 20 अप्रैल की शाम 7 बजे तक इन रेयर तस्वीरों को देखा जा सकता है। प्रदेश की हर प्राचीन इमारत और खुदाई में मिली मुर्तियों की पहली तस्वीर यहां मौजूद है। साथ में वर्तमान समय की फोटो भी लगाई गई है ताकि ये समझा जा सके कि उन धरोहरों का संरक्षण कैसे किया गया। अंग्रेजों ने करवाई थी फोटोग्राफी
रायपुर के म्यूजियम कैंपस की आर्ट गैलेरी में लगी तस्वीरें 1873 में खींची गई हैं। उस समय ब्रिटिश हुकूमत प्रदेश के प्राचीन इतिहास पर रिपोर्ट तैयार कर रही थी। ये देखा जा रहा था कि कहां क्या है, कितना पुराना है, उन जगहों को बचाने के लिए एक्सपर्ट लगे हुए थे। उस जमाने में कैमरा लिए जेडी बेगलर नाम के इतिहासविद छत्तीसगढ़ आए थे। जानकारी मिलती है कि आर्मेनियाई जे. डी. बेगलर (1845-1907) का पूरा नाम जोसेफ डेविड बेगलर था। वे एक आर्मेनियाई, इंजीनियर, पुरातत्वविद् और फ़ोटोग्राफ़र थे जिन्होने आजादी के पहले भारत में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के लिए काम किया। वे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तत्कालीन महानिदेशक अलेक्जेंडर कनिघम के सहयोगी रहे। उन्होने 1873-74 में मध्यप्रांत का सर्वेक्षण कर छत्तीसगढ़ के बहुत से प्राचीन स्थलों और धरोहरों को प्रकाश में लाया। इन जगहों की 152 साल पुरानी तस्वीरें
सिरपुर- यह पांचवी से आठवीं शताब्दी के मध्य दक्षिण कोसल की राजधानी थी। यह स्थल पवित्र महानदी के किनारे पर बसा हुआ हैं। सिरपुर में सांस्कृतिक एंव वास्तुकौशल की कला का अनुपम संग्रह हैं। पुरातन काल (सोमवंशी राजाओ का काल) में सिरपुर को `श्रीपुर` के नाम से जाना जाता था तथा यह दक्षिण कोसल की राजधानी थी भारतीय इतिहास में सिरपुर अपने धार्मिक मान्यताओ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के कारण आकर्षण का केन्द्र था। विष्णुमंदिर – 12 वी सदी में हैह्य वंश के राजाओं के द्वारा विष्णु मंदिर का निर्माण कराया गया, जो कि वर्तमान में जॉजगीर की पुरानी बस्ती के भीमा तालाब के पास स्थित है। पूर्ण मंदिर बनाने के लिये इसे दो भागों मे निर्माण किया गया। लेकिन दोनों ही भाग को मिलाने का कार्य समय में पूर्ण नही हुआ था, इसका परिणाम यह हुआ कि दोनों भाग आज भी अलग-अलग जमीन पर रखें है। अभी तक मंदिर पूर्ण नही हुआ है इसलिये यह स्थानीय लोगों के द्वारा नक्टा मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर के दीवारों में देवी-देवताओं की, गंधर्व और किन्नर प्रतिमा पर्यटकों को अपने ओर आकर्षित करती है
ये है एग्जीबिशन में
फोटो गैलेरी में 1873-74 में जे.डी. बेगलर, 1909-10 में ए.एच. लॉन्गहर्स्ट, 1955 में एम.जी. दीक्षित, 1979-80 में डोनाल्ड एम. स्टेडनर, 1983 में माईकल डब्ल्यू. मैस्टर, एम.ए. ढाकी और कृष्णदेव की खिंची प्राचीन धरोहरों की तस्वीरें हैं। महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय की 1953 में स्थापना के समय की बिल्डिंग की फोटो भी यहां है। 152 साल पुरानी यहां तस्वीरें देखने को मिलेंगी।

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