हर साल 4 फरवरी को वर्ल्ड कैंसर डे के रूप में मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य लोगों में कैंसर के प्रति जागरूकता बढ़ाना है और समय रहते पहचान तथा इलाज को बढ़ावा देना है। झारखंड में कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, राज्य में हर साल लगभग 35,000 से 40,000 नए कैंसर मरीज सामने आ रहे हैं। लेकिन सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि करीब 50 से 60 प्रतिशत मरीज तब अस्पताल पहुंचते हैं, जब बीमारी स्टेज-3 या स्टेज-4 में पहुंच चुकी होती है। नतीजा इलाज जटिल, खर्चीला और कई बार जानलेवा। आंकड़ों के अनुसार राज्य में प्रति एक लाख आबादी पर लगभग 70 लोग कैंसर से प्रभावित हो रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य में तंबाकू का सेवन कैंसर के मामलों में सबसे बड़ा योगदान दे रहा है, और लगभग 38–45% कैंसर के मामले तंबाकू के कारण सामने आ रहे हैं। पुरुषों में मुंह, फेफड़े और पेट का कैंसर प्रमुख है, जबकि महिलाओं में स्तन, गर्भाशय ग्रीवा और पेट का कैंसर सबसे अधिक देखा जा रहा है। वहीं राज्य में प्रति 2,000 से 2,500 कैंसर रोगियों पर केवल एक कैंसर विशेषज्ञ ही उपलब्ध है। सरकारी अस्पतालों में ऑन्कोलॉजिस्ट और रेडियोलॉजिस्ट के कई पद वर्षों से खाली पड़े हैं। राज्य में उन्नत सुविधाओं की कमी है। इस वजह से ज्यादातर मरीज बड़े शहरों की ओर इलाज के लिए रुख कर रहे हैं। इलाज के नाम पर 500 से 700 करोड़ रुपए सालाना जा रहा राज्य से बाहर : राज्य में हर साल 35,000 से 40,000 नए मामले सामने आते हैं। एक बड़ा प्रतिशत (अनुमानतः 30-40%) मरीज उन्नत इलाज के लिए राज्य से बाहर जाते हैं। यदि सालाना 15,000 मरीज भी बाहर जाते हैं और प्रति मरीज औसतन 3 से 5 लाख खर्च करता है तो यह राशि 500 से 700 करोड़ सालाना होती है, जो राज्य से बाहर जा रही है। अत्याधुनिक मशीनें उपलब्ध, मरीजों के मुकाबले तकनीशियनों की संख्या कम अत्याधुनिक मशीन लीनियर एक्सेलरेटर कैंसर कोशिकाओं को सटीक रूप से नष्ट करने के लिए उच्च-ऊर्जा एक्स-रे का उपयोग करती है, जो रिम्स रांची और एम्स देवघर में उपलब्ध है। इसके अलावा टाटा समर्थित रांची कैंसर हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर (आरसीएचआरसी) कांके में भी उन्नत लीनियर एक्सेलरेटर की सुविधा है। स्तन कैंसर की शुरुआती जांच के लिए एआई-सक्षम डिजिटल मैमोग्राफी मशीन रांची सदर अस्पताल में स्थापित की गई है। पेट सीटी मशीन एमटीएमएच जमशेदपुर में है। मशीनें तो उपलब्ध हैं, लेकिन उन्हें चलाने वाले सुपर-स्पेशलिस्ट डॉक्टरों, मेडिकल फिजिसिस्ट और प्रशिक्षित तकनीशियनों की राज्य में कमी है। मरीजों की संख्या के मुकाबले मशीनों और बेड की संख्या बहुत कम है। झारखंड में कैंसर स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए चुनौती झारखंड में कैंसर अब सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। राज्य में कैंसर से पीड़ित करीब 50 से 60 प्रतिशत मरीज तब अस्पताल पहुंचते हैं, जब बीमारी स्टेज-3 या स्टेज-4 तक पहुंच चुकी होती है। ऐसे में न सिर्फ इलाज जटिल हो जाता है, बल्कि मरीज और उनके परिवार पर आर्थिक बोझ भी कई गुना बढ़ जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, कैंसर के शुरुआती दो चरणों में इलाज की सफलता की संभावना अधिक होती है,। राज्य के सबसे बड़े अस्पताल रिम्स में प्रतिदिन औसतन 70 से 80 कैंसर मरीज इलाज के लिए आते हैं, जिनमें से 30% नए होते हैं। पिछले वर्ष रिम्स के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग में कुल 3,412 मरीज पहुंचे। भास्कर एक्सपर्ट डॉ. गुंजेश कुमार, ऑन्को सर्जन रांची में कैंसर के इलाज की बेहतर व्यवस्था, जागरुकता की कमी से लोग बाहर जा रहे हैं जागरुकता में कमी के कारण मरीज इधर-उधर इलाज कराने के बाद विशेषज्ञ चिकित्सकों के पास पहुंचते हैं। लेकिन तब तक मरीज की स्थिति काफी खराब हो चुकी होती है, जिससे उनकी जान बचाना बड़ी चुनौती होती है। फर्स्ट स्टेज में ही मरीज हमारे पास आ जाएं तो परेशानी से बचेंगे और इलाज से पूरी तरह ठीक हो जाएंगे। जहां तक मरीजों के बाहर इलाज कराने जाने का सवाल है तो अब स्थिति बदली है। लोग बाहर से लौट कर यहां इलाज कराने आ रहे हैं। रांची में अब कैंसर के इलाज की व्यवस्था पर लोगों का भरोसा बढ़ा है।


