भास्कर न्यूज | बालोद प्रत्यक्ष प्रणाली से 10 साल बाद हो रहे नगरीय निकाय चुनाव में निर्दलीय, बागी प्रत्याशियों के अलावा नोटा व इंड विकल्प इस बार समीकरण बिगाड़ेंगे या नहीं? यह 15 फरवरी को मालूम हो जाएगा। वैसे प्रत्यक्ष प्रणाली से 2004, 2009, 2014 में हुए 3 चुनाव के ट्रेंड पर गौर करें तो निर्दलीय प्रत्याशी कम वोट पाकर हारने के बावजूद भाजपा व कांग्रेस का समीकरण बिगाड़ने में सफल रहे हैं। इस बार बालोद नपा अध्यक्ष की कुर्सी के लिए भाजपा व कांग्रेस के अलावा दो निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में है। इसके अलावा नोटा विकल्प भी है। ईवीएम (इलेक्ट्रॉिनिक वोटिंग मशीन) इंड विकल्प पर जिन वोटर्स ने बटन दबाया है, उसका कोई औचित्य नहीं रहेगा बावजूद अध्यक्ष पद के लिए एक-एक वोट महत्वपूर्ण है। ऐसे में इस बार के चुनाव में इंड विकल्प भी भाजपा व कांग्रेस के लिए चुनौती बनी हुई है। निर्दलीय प्रत्याशी से किस पार्टी को कितना नुकसान होगा, यह 15 फरवरी को स्पष्ट हो जाएगा। वर्ष 2004 में निर्दलीयों को कुल 4500 वोट मिले थेे वर्ष 2004-05 में प्रत्यक्ष प्रणाली से अध्यक्ष चुनाव हुआ था। निर्दलीय प्रत्याशी की वजह से रोचक मुकाबले में भाजपा के राकेश यादव 129 वोटों से जीते थे। रोचक मुकाबले में राकेश को 4 हजार 629, विनोद कौशिक को 4 हजार 500, रामजी भाई पटेल को 2200 वोट मिले थे। मायने क्या- इस चुनाव में हार-जीत का अंतर महज 129 वोटों का रहा। आलम यह रहा कि कांग्रेस का प्रत्याशी तीसरे नंबर पर रहा। जबकि निर्दलीयों को कांग्रेस से 2 हजार वोट ज्यादा मिले। वर्ष 2009-10 में हुए चुनाव में भाजपा के लीला शर्मा को 5 हजार 588 वोट मिले थे। वहीं कांग्रेस की संगीता शर्मा को 4 हजार 373 वोट मिले थे। जबकि स्वाभिमान मंच की अनुपमा योगी को 2 हजार 399 वोट मिले थे। भाजपा जीतने में सफल रही लेकिन स्वाभिमान मंच के प्रत्याशी की वजह से भाजपा व कांग्रेस के वोटों का ग्राफ कम रहा। मायने क्या- भाजपा व कांग्रेस में हार जीत का अंतर 1215 वोटों का रहा। जबकि हार-जीत के अंतर से 1184 ज्यादा वोट स्वाभिमान मंच की योगी को मिला था। ऐसे में इस चुनाव में स्वाभिमान मंच ने समीकरण बिगाड़ा था।


