विधानसभा की लाइव स्ट्रीमिंग को लेकर कोर्ट जाएगी कांग्रेस:हाईकोर्ट में दायर होगी याचिका; नेता प्रतिपक्ष बोले- विधायकों में भेदभाव ठीक नहीं

चाहे पक्ष हो या विपक्ष, चुने हुए जनप्रतिनिधि सदन के अंदर क्या कर रहे हैं, क्या बोल रहे हैं और जनता के लिए क्या बात कर रहे हैं, यह जानना सबका समान अधिकार है। विधानसभा में जनसमस्याओं पर होने वाली बहस का लाइव टेलीकास्ट भाजपा सरकार क्यों नहीं दिखाना चाहती? जब दूसरे राज्यों में यह संभव है, तो मध्यप्रदेश में क्यों नहीं हो रहा ? इसे लेकर हम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने मीडिया से चर्चा के दौरान यह बात कही। ऐसे में विधानसभा की लाइव स्ट्रीमिंग को लेकर कांग्रेस जल्द हाईकोर्ट का रुख करेगी। सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस की ओर से सरदारपुर विधायक प्रताप ग्रेवाल और कसरावद विधायक और पूर्व कृषि मंत्री सचिन यादव हाईकोर्ट में याचिका दायर करेंगे। याचिका में विधानसभा की कार्यवाही के लाइव टेलीकास्ट की मांग की जाएगी। कांग्रेस विधि विशेषज्ञों की मदद से अगले हफ्ते इंदौर खंडपीठ में याचिका दायर करने की तैयारी है। कांग्रेस लगातार कर रही है मांग नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर को पत्र लिखकर यह मांग कर रहे हैं कि विधानसभा की कार्यवाही का लाइव टेलीकास्ट किया जाए। उनका कहना है कि जब लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही का लाइव टेलीकास्ट होती है, संसद का अपना टीवी चैनल है। यूपी, छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों की विधानसभाओं की कार्यवाही भी लाइव दिखाई जाती है, तो मध्यप्रदेश विधानसभा की कार्यवाही का टेलीकास्ट क्यों नहीं किया जाता? बजट सत्र में केवल राज्यपाल और सीएम को दिखाते है सिंघार ने कहा कि बजट सत्र के दौरान राज्यपाल का अभिभाषण और मुख्यमंत्री का वक्तव्य लाइव दिखाने के लिए सरकारी तंत्र के कैमरे लगाए जाते हैं और न्यूज चैनलों पर प्रसारित किए जाते हैं। मध्यप्रदेश में ई-विधान की तैयारी मध्यप्रदेश विधानसभा को ई-विधान में तब्दील करने की तैयारी अंतिम चरण में है। ई-विधान लागू होने के बाद नेशनल इंफोर्मेटिक्स सेंटर (NIC) तीन साल तक इसका संचालन करेगा। तब तक विधानसभा को अपनी व्यवस्था विकसित करनी होगी। जिला स्तर पर एनआईसी विधायकों को प्रशिक्षण देने में सहयोग करेगा। सदन के भीतर हर टेबल पर 9 या 10 इंच का टैबलेट लगाया जाएगा। विधानसभा सूत्रों का कहना है कि ई-विधान लागू होने के बाद हर साल कागजों पर होने वाला 15 से 20 लाख रुपए का खर्च बचने लगेगा। अभी तक 20 राज्य केंद्र सरकार के साथ त्रिपक्षीय एमओयू कर चुके हैं। गुजरात, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में ई-विधान पहले ही शुरू हो चुका है।

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