विमेंस-डे स्पेशल…ताइवान में सेमिकंडक्टर्स बनाएंगी बिलासपुर की ममता:2 साल की उम्र में पेरेंट्स ने छोड़ा, रिक्शा चलाकर नाना ने पाला;एक पोस्ट ने बदली जिंदगी

विमेंस डे पर आप अपने इर्द-गिर्द, अखबारों के पन्नों, सोशल मीडिया के फीड्स और बाकी दूसरी जगहें, जहां से भी कंटेंट कंज्यूम करते हैं। बहुत सी महिलाओं की स्ट्रगल या सक्सेस की स्टोरी पढ़, देख और सुन रहे हाेंगे। एक स्टोरी हम भी आपके लिए लेकर आए हैं। लेकिन, इस दफा छोटा सा प्रयोग करते हैं, स्टोरी पढ़ने से पहले पिक्चर परसेप्शन टेस्ट यानी PPT से होकर गुजरिए। नीचे एक तस्वीर है, इस तस्वीर को ध्यान से देखिए, कुछ मिनट लीजिए। अपने माइंड में एक स्टोरी बिल्ट कीजिए। ध्यान रखिए, स्टोरी तस्वीर में दिख रहे कैरेक्टर पर बेस्ड होनी चाहिए। उम्मीद है आपने कहानी बुन ली होगी। अब हम आपको तस्वीर में जो लड़की दिख रही है, उसकी असल जिंदगी की कहानी बताते हैं। आपने जो भी इमेजनरी कहानी अपने माइंड में बनाई या सोची होगी, उस कहानी को हकीकत से कम्पेयर करिएगा। लेकिन, पहले तस्वीर में दिख रही लड़की से आपको थोड़ा इंट्रोड्यूस करा देते हैं। इनका नाम ममता कुर्रे है, अभी 26 साल की हैं और ऊपर की तस्वीर जो आपने देखी वो 12वीं की है। मूल तौर पर ममता बिलासपुर की रहने वाली हैं। हाल में ताइवान से इलेक्ट्रिकल और कंप्यूटर साइंस से M.TECH किया है और जल्दी ही ताइवान की एक बड़ी सेमिकंडक्टर कंपनी में इंजिनियर के तौर पर अपनी सर्विस देंगी। अब तक आपको सब कुछ बहुत कॉमन सा साउंड कर रहा होगा। लेकिन ममता दो साल की थीं, जब उनके पिता बिना कुछ कहे घर छोड़कर निकल गए। मां ने भी बेटी को अपने पिता यानी ममता को उनके नाना के यहां छोड़ा और दूसरी शादी कर ली। नाना रिक्शा चलाते हैं। फाइनेंशियल कंडीशन ऐसी कि 600 रुपए स्कूल की फीस भी ममता नहीं दे पाईं थी। छोटे से झोपड़े में छप्पर के नीचे बैठकर पढ़ती थीं। लेकिन 12वीं में जिला टॉप किया और यहां से कहानी एकदम से बदल गई। लेकिन जिस तरह से बदली वो बिल्कुल इमेजनरी लगती है, पर है हकीकत। पढ़िए कहानी… साल 2017 में शुरू हुई स्टोरी मई की तपती दोपहरी के बीच एक वीडियो जर्नलिस्ट और रिपोर्टर बिलासपुर से लगे छोटे से गांव अमेरी की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। यहां इन्हें वेदराम नाम के आदमी से मुलाकात करनी है। रिपोर्टर का नाम विश्वेश ठाकरे है और उनके साथी का नाम उमेश मौर्य। दरअसल, कुछ देर पहले ही 12वीं बोर्ड के नतीजे आए हैं और विश्वेश के हाथ जिले के टॉपर्स की एक्सक्लूसिव लिस्ट लगी है। इस लिस्ट की टॉप में ममता कुर्रे का नाम है। कांटेक्ट पर्सन के कॉलम में वेदराम का नंबर था। इसलिए वेदराम से मुलाकात बेहद जरुरी हो चुकी है। अमेरी चौक पर रिक्शा चला रहे बुजुर्ग ने ममता से मिलवाया मोबाइल पर वेदराम ने विश्वेश से कहा था, अमेरी चौक पर आकर मिलिए। चौक पर पहुंचकर विश्वेश ने दोबारा वेदराम को कॉल किया। बातचीत शुरू ही हुई कि एक बुजुर्ग रिक्शे वाले ने अपना एक हाथ ऊपर उठाकर विश्वेश की ओर तेजी से हिलाना शुरू किया। रिक्शे वाले की उम्र लगभग 60 साल के करीब लग रही है। बदन पर चेक शर्ट है, जो वेदराम की तरह ही उम्रदराज दिखती है। पतलून टखने के ऊपर तक फोल्ड है, जिसे अभी के फैशन विशेषज्ञ एंकर लेंथ कहते हैं। और ये इन दिनों के लड़कों में काफी ट्रेंडिंग है। रिक्शे वाले ने बताया कि वही वेदराम हैं और ममता उनकी नातिन हैं। वेदराम को रिपोर्टर विश्वेश ने बताया कि ममता ने 12वीं बोर्ड में जिला टॉप किया है। ये सुनते ही वेदराम बेहद खुश हो गए। ये खुशी गणनात्मक तौर पर कितनी खुशी थी, ये सिर्फ वेदराम बता सकते हैं। लेकिन, वेदराम अपनी खुशी को एक्सप्रेस करने में तब बहुत समर्थ दिखे नहीं। ऐसे में विश्वेश के कहे मुताबिक वो सीधे उन्हें और उनके साथी मौर्य को अमेरी गांव में अपने छोटे से झोपड़े पर ले गए। और यहां फाइनली ममता से उनकी मुलाकात हुई । छोटे से झोपड़ी के एक कोने पर बैठी हुई थीं ममता विश्वेश बताते हैं कि जब वो झोपड़ी के भीतर ममता से मिलने गए। ममता एक कॉर्नर पर तड़की हुई फर्श पर बैठी हुईं थी। कुछ नोट्स बना रही थीं। अगल–बगल में कई लेयर्स में उन्होंने किताबें जमाकर रखी हुई थी। तो कुछ फर्श पर बिखरी पड़ी थी। वहां बैठकर पढ़ाई कर पाना चैलेंजिंग था। विश्वेश बतातें हैं कि ममता किसी तरह ये सबकुछ मैनेज कर रही थीं। लेकिन आस–पास का महौल उनके लिए चीजों को और कठिन बना रहा था। पड़ाेसियों के घरों में पूरे समय लाउडस्पीकर पर फिल्मी गाने बज रहे थे। नशे में कुछ लोग लगातार उत्पात कर रहे थे। ममता ने बताया- एक सोशल मीडिया अपील ने बदली लाइफ ममता ने भास्कर को बताया अपनी बस्ती में वो 12वीं तक पहुंचने वाली वो इकलौती लड़की थी। उनको आगे भी पढ़ाई जारी रखनी थी। लेकिन कुछ समझ नहीं आ रहा था आगे की पढ़ाई होगी कैसे? लेकिन विश्वेश ने सोशल मीडिया पर उनकी कहानी पोस्ट की, इसके बाद जिंदगी बदली। विश्वेश की पोस्ट का असर ये रहा था कि उन्हें लोकल एडमिनिस्ट्रेशन से मदद मिली। कुछ और लोग भी फाइनेंशियल हेल्प के लिए आगे आए। इसी बीच दिल्ली में PhD कर रहे चंद्रदीप सिंह उनके घर पहुंचे। आगे की पढ़ाई के उन्होंने ही गाइड किया। घर वाले चाहते थे कि वो बिलासपुर में ही रहकर पढ़ाईं करें। लेकिन चंद्रदीप ने उन्हें बताया कि DU में मेरिट के बेस पर एडमिशन हो सकता है। उन्होंने आगे की पढ़ाई दिल्ली से करने के लिए मोटिवेट किया। मिरांडा हाउस कॉलेज में एडमिशन मिला। सरकार और कुछ निजी कंपनियों से स्कालरशिप मिली। कर्ज लेकर पहुंची ताइवान, MTech पूरा किया जिसके चलते वो दिल्ली में सर्वाइव कर पाईं। उन्होंने बीएएसी और फिजिक्स ऑनर्स से मास्टर पूरा किया। जो कि सेमिकंडक्टर्स और चिप्स में काम करना था, उन्होंने आगे ताइवान से पढ़ाई करना तय किया। लेकिन ताइवान पहुंचने का रास्ता उनके लिए आसान नहीं था। ताइवान तक के सफर और इनिशियल स्टेज में वहां रहने–खाने का खर्च निकालना सबसे बड़ा चैलेंज था। लोन मिला नहीं। उनके पास कुछ ऐसा था ही नहीं जिसके बेस पर बैंक ट्रस्ट करे और उन्हें लोन मिले। ऐसे में कुछ लाख रूपए उन्हें कर्ज के तौर पर लेने पड़े। ताइवान की सेमीकंडक्टर कंपनी में बनेंगी इंजीनियर यहां उन्हें लोकल स्कालरशिप के बारे में पता चला, शर्त थी कि पढ़ाई के दौरान हर साल हाई ग्रेड परफॉर्मेंस मेनटेन करना पड़ेगा। उन्होंने स्कालरशिप ली और कोर्स खत्म होने तक अपना हाई ग्रेड मेनटेन रखा। और अब वो अपना एम टेक पूरा कर चुकी हैं। अब जल्दी ही ताइवान की एक बड़ी सेमिकंडक्टर कंपनी में इंजिनियर के तौर पर अपनी सर्विस देंगी।
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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर दुनिया भर में महिलाओं की उपलब्धियों और सशक्तिकरण का जश्न मनाया जा रहा है। इसी बीच छत्तीसगढ़ की एक बेटी तकनीक की दुनिया में नई पहचान बना रही है। रायपुर की आस्था मानिक (29) ने अपनी मेहनत और जिज्ञासा के दम पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के क्षेत्र में कदम रखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ का नाम रोशन किया है। पढ़ें पूरी खबर

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