30 साल बाद बांदीकुई के श्यालावास कलां की सावा नदी गवाह बनी है उस मिलन की जो मानवता और कृतज्ञता का परिचय करा रही है। कहानी है- उफनती नदी में बच्चा लहरों के बीच छटपटा रहा है। नदी ना केवल उसे बहा रही है, बल्कि डुबाती जा रही है। तभी बाबा की नजर बच्चे पर पड़ी। वे दौड़े और नदी में कूद गए। नदी में खाई आ गई। बाबा भी बहे। बच्चे को बचाना है मगर खुद तो बचें। लेकिन भगवान ने सुन ली। लहरों से लड़कर बच्चे को निकाल लाए। वह बच्चा अब 44 साल का हो गया है। दोनों उसी जगह खड़े हैं। भास्कर संवाददाता की मौजूदगी में बाबा लक्ष्मण गुर्जर और सुशील गुप्ता उस खौफनाक वाकये की याद ताजा कर रहे हैं। साथ में दादी गणेशी भी हैं। सुशील बताते हैं- 1995 में वे आठवीं में पढ़ रहे थे। मानसून सीजन में नदी में भारी उफान था। मैं किनारे खड़ा था। अचानक पैर फिसला और जा गिरा नदी में। तैरना आता नहीं था। कुछ मिनट पानी में छटपटाया। लहरों के साथ बहने लगा। फिर मुझे कुछ याद नहीं। बाबा ने बताया- गणेशी चिल्लाई तो मेरा ध्यान गया। कपड़े जूती उतारने का वक्त नहीं था। मैं भी बह गया पर बच्चे के बाल पकड़ में आ गए। किनारे लाया तो इसकी धड़कन चल रही थीं। उल्टा लिटाकर पेट का पानी, फिर हॉस्पटिल पहुंचाया। इसे पकती उम्र में देखकर अच्छा लगा।लक्ष्मण ने आशीर्वाद दिया- जुग जुग जियो। सुशील का बेटा भी दंग है उस हादसे की सुनकर। वह कह रहा है भगवान बाबा हैं ये।


