वेदांताचार्य बोले-असफलता से घबराएं नहीं, गुरु की शरण लें:युवा धर्म और अध्यात्म से जुड़ेंगे तभी भटकाव खत्म होगा,रिश्ते बचाने के लिए आदर्श जरूरी

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में छोटी-छोटी बातों पर भड़कना, रिश्तों का टूटना और नशे की लत समाज की सबसे बड़ी समस्या बन गई है। ब्रह्म धाम आसोतरा के वेदांताचार्य डॉ. ध्यानाराम महाराज ने दैनिक भास्कर से विशेष बातचीत में युवाओं को सलाह दी कि अगर वे धर्म और अध्यात्म का दामन थाम लें, तो नशे और भटकाव से खुद को बचा सकते हैं। वेदांताचार्य इन दिनों समाज में शिक्षा और संस्कारों को बढ़ावा देने की मुहिम चला रहे हैं। उन्होंने कहा, “विश्व बंधुत्व की भावना से युवा आगे बढ़ें। इसी मकसद से हम प्रतिभा सम्मान समारोह आयोजित कर रहे हैं। हमारी संस्कृति और शास्त्र ही हमारी सच्ची विरासत हैं। जब हम समाज के लिए सक्रिय होते हैं, तो अपने कर्तव्यों का अहसास होता है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि समाज और राष्ट्र के हित में काम करने वाले को सम्मान खुद-ब-खुद मिल जाता है। “अगर कर्म और नजरिया शुद्ध हो, तो लोग खुद आपके पास आएंगे। युवाओं को यही सिखाना चाहिए कि अपनी काबिलियत को देश और समाज की सेवा में लगाएं।” प्रतिभा को सही दिशा दें, वरना खुद से टकराएगी युवाओं में बढ़ते गुस्से पर वेदांताचार्य ने कहा, “प्रतिभा अगर धर्म, अध्यात्म और व्यावहारिकता से नहीं जुड़ती, तो वह अपनी ही ऊर्जा से लड़ती रहती है,चाहे खुद से, परिवार से या अपनों से। इसलिए युवाओं को चाहिए कि अपनी ताकत को धर्म से जोड़ें, ताकि उसका सही इस्तेमाल हो।” उन्होंने रावण और हनुमान का रोचक उदाहरण दिया: “दोनों ही होशियार थे, लेकिन रावण ने अपनी विद्या को सिर्फ खुद के फायदे तक रखा, जबकि हनुमानजी ने उसे समाज और भगवान राम की सेवा में लगाया। आज हर कोई हनुमानजी की पूजा करता है, लेकिन रावण का नाम तक लेना पसंद नहीं। रामायण और गीता को जीवन का आधार बनाएं, तभी सही रास्ता मिलेगा।” रिश्तों का टूटना: आदर्श की कमी है वजह टूटते रिश्तों पर उन्होंने कहा, “जिंदगी में अगर कोई आदर्श न हो, तो रास्ता नहीं सूझता और भटकाव बढ़ता है। हमें ऋषि-मुनियों, संतों और स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुषों को आदर्श मानना चाहिए। किसी को आदर्श बनाएं, तभी जीवन आसान और दिशा से भरपूर होगा।” नशा करने वाले अध्यात्म से जुड़ें युवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति पर वेदांताचार्य ने कहा कि नशा करने वाले अगर अध्यात्म या किसी संत से जुड़ जाएं, तो वे इससे बाहर निकल सकते हैं। जो अपने माता-पिता या गुरु को हृदय से स्वीकार करता है, वह कभी गलत रास्ते पर नहीं जाता। उन्होंने पतंजलि ऋषि का उदाहरण देते हुए कहा कोई भी काम करने से पहले उसके परिणाम पर विचार करें; बिना सोचे किया गया हर कार्य जीवन में कष्ट लाता है। इसलिए नशे के दुष्परिणाम पर जब चिंतन करेंगे तो अपने आप ही नशे से युवा दूर हो जाएंगे। असफलता पर निराश न हों कई युवा प्रतियोगी परीक्षाओं या करियर में असफल होकर निराश हो जाते हैं। इस पर वेदांताचार्य बोले, यदि पूरे प्रयास के बावजूद सफलता न मिले, तो परमात्मा या किसी गुरु की शरण लें। प्रेरणा पुरुष की ओर देखने से जीवन में नई दिशा मिलती है। युवाओं को चाहिए कि वे कर्म, चरित्र और चिंतन में पवित्रता लाएं। जब प्रतिभा धर्म और अध्यात्म से जुड़ेगी, तभी राष्ट्र सशक्त और समाज संस्कारवान बन पाएगा।

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