सनातन सबका है, सनातन का मतलब होता है सेवा करना। जिस प्रकार से सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी, वायु, जल आकाश निरंतर हमारी सेवा कर रहे हैं। उसी प्रकार हमें भी निरंतर उस परमात्मा की सेवा करनी चाहिए, जो मनुष्य के अंदर बसा हुआ है। यह शरीर नाशवान है, जो चेतन आत्मा है, उसका कभी नाश नहीं होता। पांच तत्वों से मिलकर यह शरीर बना होता है। यह शरीर जगत का है और जगत में ही चला जाता है, नाशवान है। परंतु अविद्या के कारण इस नाशवान शरीर हो हम अपना मानने लगते हैं। सनातन धर्म मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। सभी में भाईचारे की भावना से प्रेरित होकर अपने संबंधियों से ऊपर उठकर वसुधैव कुटुंबकम् की बात करता है। एरोड्रम क्षेत्र में दिलीप नगर नैनोद स्थित शंकराचार्य मठ इंदौर के अधिष्ठाता ब्रह्मचारी डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने अपने नित्य प्रवचन में रविवार को यह बात कही। अनैतिक कृत्य करने के लिए रोकता है सनातन धर्म महाराजश्री ने कहा कि सनातन धर्म कहता है कि हमने गिलास तु्म्हें पानी पीने के लिए दिया है, इसलिए नहीं कि वह तुम्हारी हो गई। इस तरह परमात्मा ने सनातन धर्म की सेवा के लिए यह शरीर दिया है, पर यह हमारा नहीं है। यह परमात्मा का है और परमात्मा के पास ही चला जाता है। जब यह शरीर धीरे-धीरे क्षीण होने लगता है तो इस शरीर को छोड़ते समय हमें बड़ा कष्ट होता है। यदि हमारे मन में यह भाव आ जाए कि यह तो परमात्मा का है और इसे परमात्मा के पास जाना है तो हमारे द्वारा अनैतिक कृत्य ही न हों। दुष्कृत्य और अनैतिक कृत्य करने के लिए हमें सनातन धर्म रोकता है। डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने कहा कि सनातन धर्म के पुनरुद्धारक आदि गुरु शंकराचार्य ने उस समय नास्तिकों से शास्त्रार्थ करके उन्हें पराजित कर सनातन धर्म का पुनरुद्धार किया। आज हमारा सौभाग्य है कि उसी परंपरा के अंतर्गत स्थापित चार पीठों में से एक द्वारका पीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंदजी सरस्वती महाराज इंदौर में पधारे हैं। उनकी इस कृपा के लिए हम सभी उनके आभारी हैं।


