सनातन धर्म सबका और बहुत सरल है। सनातन का मतलब होता है सेवा करना, सत्य पर जीना औ असत्य से दूर रहना। पर कुछ तथाकथित लोग नकली चोला पहनकर अपने नाम के साथ भ्रमपूर्ण उपाधियां लगाकर सनातन धर्म का प्रचार करते हैं, यह अजीब-सा लगता है। क्योंकि जो स्वयं ही असत्य पर आधारित हैं वे सत्य का प्रचार कैसे कर सकते हैं। केवल सनातन की आड़ मे अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए लोगों में भ्रामक प्रचार करना ठीक नहीं है। एरोड्रम क्षेत्र में दिलीप नगर नैनोद स्थित शंकराचार्य मठ इंदौर के अधिष्ठाता ब्रह्मचारी डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने अपने नित्य प्रवचन में मंगलवार को यह बात कही। चार शंकराचार्य असली, बाकी सब स्वयंभू महाराजश्री ने कहा कि आप जो हैं उसी रूप में समाज के सामने आकर सनातन धर्म की बात करेंगे तो यह उचित है लेकिन धूर्ततापूर्वक संत का चोला पहनाकर स्वार्थ में लिप्त होकर सनातन की आड़ में स्वार्थ सिद्ध कर रहे हों तो यह न केवल सनातन धर्म का अपमान है वरन सामाजिक अपराध भी है। यह बात भी बताना उपयुक्त है कि आद्य शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए देश की चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना की थी और उन पर आचार्य नियुक्त किए थे, जो शंकराचार्य कहलाते हैं। आज भी ये चार ही मठ हैं, लेकिन शंकराचार्य 50 से अधिक घूम रहे हैं। वास्तव में चार मठों के मान्य शंकराचार्य चार ही हैं जो कि पूर्व में पुरी में गोवर्धन पीठ के निश्चचलानंद सरस्वती, दक्षिण में शृंगेरी के भारती तीर्थ, पश्चिम में द्वारका में शारदा पीठ के सदानंद सरस्वती और उत्तर में ज्योर्तिमठ बद्रीकाश्रम के अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती हैं। इनके अलावा जो भी स्वयं को शंकराचार्य कहते हैं वे सभी नकली हैं। सनातन धर्मावलंबियों को यह तो पता होना ही चाहिए कि उनके वास्तविक आचार्य और गुरु कौन हैं। यह नहीं पता हो तो मान्य संस्थाओं के संतों से मार्गदर्शन लेना चाहिए। सनातन धर्म सत्य पर ही अटल रहता है… डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने कहा कि दुर्भाग्यवश चकाचौंध में लिप्त सनातनी समर्थक भी इस बात के लिए दोषी हैं कि वे स्वयंभू शंकराचार्यों को किसी कारणवश महत्व देते हैं। इस तरह नासमझ लोगों को भी इनका समर्थक बना देते हैं। कारण यह है कि सर्वमान्य सनातन धर्म के चार शंकराचार्यों तक ये धूर्त लोग अपने समर्थकों को पहुंचने ही नहीं देते हैं। जागरूक लोगों को ऐसे छली-कपटी, मिथ्याचारी लोगों को बेनकाब कर उन्हें उनके समर्थकों के सामने वास्तविक स्वरूप में लाने की जिम्मेदारी निभाकर सनातन धर्म के मूल स्वरूप को प्रचारित कर लोगों के सामने रखना चाहिए। झूठ, फरेब, मिथ्याचार सनातन धर्म को बिल्कुल भी रास नहीं आता है, क्योंकि सनातन धर्म सत्य पर जीता है और सत्य पर ही अटल रहता है।


