शंकराचार्य मठ इंदौर में प्रवचन:कोई कैसा भी व्यवहार करे, पर सबमें परमात्मा के मत को हम नहीं छोड़ सकते- डॉ. गिरीशानंदजी महाराज

कोई आदमी हमें गाली देता है तो उसमें भगवान कैसे देखें? उत्तर है- उपनिषद में आया है कि शब्द (वाणी) ही ब्रह्म है। वांग्मयी ब्रह्मेती…संत कहते हैं- जो तू चेला देह को, देह खेह की खान। जो तू चेला शबद को शबद ब्रह्म कर मान। …कहने का मतलब शब्द भी भगवान स्वरूप है। कोई अच्छा कहे या बुरा, वह भी भगवान है। क्योंकि वराह अवतार में भगवान सू्अर भी बनते हैं और वामन अवतार में ब्रह्मचारी ब्राह्मण भी बनते हैं, सूअर और ब्राह्मण दोनों ही भगवान हैं, तो गाली भगवान क्यों नहीं हो सकती। कोई कैसा भी व्यवहार करे, पर सबमें परमात्मा के मत को हम नहीं छोड़ सकते। एरोड्रम क्षेत्र में दिलीप नगर नैनोद स्थित शंकराचार्य मठ इंदौर के अधिष्ठाता ब्रह्मचारी डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने अपने नित्य प्रवचन में शनिवार को यह बात कही। हम अपनी अच्छाई क्यों छोड़ें महाराजश्री ने एक दृष्टांत सुनाया- एक संत नदी में स्नान कर रहे थे। उन्होंने एक बिच्छू को जल में बहते हुए देखा। उन्होंने अपने हाथ से बिच्छू को जल से बाहर निकालने का प्रयास किया। हाथ लगाते ही बिच्छू ने डंक मार दिया और वह हाथ से छूट गया। संत ने उसे फिर निकालने का प्रयास किया। बिच्छू ने फिर डंक मारा। यही क्रम चलता रहा। अंतत: साधु ने उसे पानी से बाहर निकाल ही दिया। लोगों ने कहा- वह बिच्छू बार-बार अपना डंक आपको मारता रहा, पर आप उसे निकालते रहे। साधु ने कहा- वह अपना स्वभाव नहीं छोड़ता तो मैं अपना स्वभाव (अच्छाई) क्यों छोड़ूं। कहने का मतलब है यदि कोई व्यक्ति अपनी बुरी बात नहीं छोड़ता तो आप अपनी अच्छी बात और सुसंस्कृत भाषा क्यों छोड़ोगे।

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