राजधानी में अब मौत के कारण जानने के लिए शव की चीरफाड़ जरूरी नहीं रहेगी। जापान समेत विकसित देशों में अपनाई जा रही वर्चुअल ऑटोप्सी तकनीक को एम्स भोपाल में शुरू होना है। इस आधुनिक तकनीक से शव का पोस्टमॉर्टम बिना किसी सर्जिकल कट के किया जा सकेगा। महज 30 मिनट में मौत के कारणों का पता लगाया जा सकेगा। सोमवार को एम्स भोपाल प्रबंधन ने भारत सरकार की स्टैंडिंग फाइनेंस कमेटी की बैठक में इस परियोजना का औपचारिक प्रस्ताव रखा। इसे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से पहले ही सैद्धांतिक मंजूरी मिल चुकी है। अब प्रस्ताव वित्त मंत्रालय के समक्ष है, जहां से फंड जारी होने की प्रक्रिया पूरी होगी। भोपाल सांसद आलोक शर्मा के मुताबिक प्रस्ताव को जल्द ही वित्तीय स्वीकृति मिल सकती है। यदि परियोजना को मंजूरी मिलती है तो एम्स भोपाल देश का तीसरा शहर बनेगा, जहां यह अत्याधुनिक तकनीक उपलब्ध होगी। भारत में इसकी शुरुआत वर्ष 2021 में एम्स दिल्ली से हुई थी। इसके बाद शिलांग स्थित एनईआईजीआरआईएचएमएस में यह सुविधा शुरू की गई, जबकि एम्स ऋषिकेश में सेटअप को पहले ही मंजूरी मिल चुकी है। अंदरूनी चोटों का सटीक विश्लेषण हो सकेगा केंद्र सरकार की योजना 2026 की शुरुआत तक देशभर में 38 से अधिक विशेष वर्चुअल ऑटोप्सी लैब स्थापित करने की है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार इस तकनीक में सीटी स्कैन, एमआरआई और 3डी इमेजिंग का उपयोग होता है। पूरे शरीर की हाई-रिजोल्यूशन डिजिटल इमेज के आधार पर मौत का कारण, समय और अंदरूनी चोटों का सटीक विश्लेषण किया जाता है। इसकी सटीकता करीब 90 प्रतिशत तक मानी जाती है। डिजिटल साक्ष्य के रूप में मजबूत प्रमाण साबित होगी
एम्स भोपाल के फॉरेंसिक मेडिसिन एवं टॉक्सिकोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. राघवेंद्र कुमार विदुआ बताते हैं कि वर्चुअल ऑटोप्सी खासतौर पर ट्रॉमा, सड़क हादसों और संक्रामक बीमारियों से जुड़ी मौतों में बेहद उपयोगी है। इसमें संक्रमण का खतरा कम होता है, शव की गरिमा बनी रहती है और इससे तैयार होने वाली रिपोर्ट डिजिटल साक्ष्य के रूप में अदालत में मजबूत प्रमाण साबित होती है।


