रायपुर में 13 साल की मासूम का अपहरण कर उसके साथ दुष्कर्म करने वाले एक व्यक्ति को 20 साल कैद की सजा सुना सुनाई गई है। विशेष लोक अभियोजक गीता चौहान ने बताया कि मामले में दुष्कर्म करने वाला व्यक्ति, बच्ची का परिचित था। शादी का झांसा देकर उसे अपने साथ ले गया। इसके बाद उसे घर पर बंदी बना लिया। दो दिन तक जबरदस्ती की। न्यायाधीश गिरीश कुमार मंडावी ने इसे गंभीर अपराध बताते हुए सजा सुनाई है। अपहरण का मामला दुष्कर्म तक पहुंचा 2 अगस्त, साल 2024। दोपहर करीब 12 बजे गुढ़ियारी थाना क्षेत्र की एक गली से 13 साल 10 महीने की बच्ची अचानक गायब हो गई। घरवालों को लगा शायद वह आसपास की सहेलियों के पास गई होगा। लेकिन घंटों बीत जाने के बाद भी बच्ची लौटी नहीं। अगली सुबह डरी-सहमी बच्ची की मां थाने पहुंची। अपनी नाबालिग बेटी के गुम होने की रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने खोजबीन शुरू की। आरोपी ने नानी के घर पर बच्ची को किया था कैद जांच के दौरान पता चला कि बच्ची को बहला-फुसलाकर आरोपी उसे अपने नानी के घर ले गया, कबीर नगर ले गया है। आरोपी ने बच्ची से शादी का वादा किया था। अदालत में दर्ज रिकॉर्ड के मुताबिक, 2 अगस्त से 3 अगस्त 2024 तक बच्ची आरोपी के कब्जे में रही। बच्ची का कहना था कि आरोपी ने रात में उसके साथ लगातार तीन–चार बार शारीरिक संबंध बनाए। बच्ची ने बताया कि आरोपी ने उसका मोबाइल अपने पास रख लिया, ताकि वह किसी से संपर्क न कर सके। अभियोजक गीता चौहान ने बताया कि ये सिर्फ “प्रेम प्रसंग” या “भाग कर शादी” नहीं, बल्कि 16 साल से कम उम्र की बच्ची के साथ बार-बार बलात्कार और ‘गंभीर प्रवेशन लैंगिक हमला’ एग्रावेटेड पेनिट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट था। पुलिस ने बताया – मां के शक के आधार पर जांच शुरू हुई पीड़िता की मां ने थाने में जो FIR दर्ज कराई, वह इस केस की शुरुआती कड़ी बनी। मां का कहना था कि उसकी नाबालिग बेटी को किसी ने बहला-फुसलाकर भगा ले गया है। इसी के आधार पर जांच शुरू हुई। और पुलिस आरोपी तक पहुंची। पुलिस ने बताया- इसी दौरान पीड़िता ने विस्तार से बताया कि कैसे आरोपी ने दो दिनों में एक से ज्यादा बार उसके साथ जबरन संबंध बनाए। उम्र साबित करना बड़ा चैलेंज था जांच एजेंसी के लिए लड़की उम्र साबित करना बड़ा चैलेंज था। यह साबित करना जरूरी था कि पीड़िता नाबालिग है और घटना के समय उसकी उम्र 18 से कम, बल्कि 16 से भी कम थी। इसके लिए स्कूल का प्रगति पत्रक दाखिल-खारिज पंजी रिकॉर्ड में लिया गया, जिससे उसकी उम्र 13 वर्ष 10 माह सिद्ध हुई। इसके अलावा पीड़िता और आरोपी के प्राइवेट पार्ट की जांच, पहने हुए कपड़ों, वेजाइनल स्लाइड, स्वैब, नाखून के टुकड़ों को फोरेंसिक जांच के लिए लैब भेजा गया। कोर्ट में डिफेंस ने कहा- बच्ची सिखाया हुआ बयान दे रही सुनवाई के दौरान डिफेंस ने एक अहम प्वाइंट उठाया –जिरह में पीड़िता ने स्वीकार किया कि उसकी मां ने उससे कहा था कि “थाने में जैसा बयान दिया है, वैसा ही कोर्ट में भी कहना।” डिफेंस ने इसे सिखाया हुआ गवाह बताने की कोशिश की। लेकिन अदालत ने साफ कहा: कोर्ट ने माना कि मात्र यह कहने भर से कि “मां ने वैसा ही बोलने को कहा” पूरी गवाही अविश्वसनीय नहीं हो जाती, खासकर तब जब वह गवाही सुसंगत और स्वाभाविक हो। पॉक्सो की दो धाराओं ने आरोपी को दिलाई सजा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO) की दो धाराएं इस केस में निर्णायक रहीं – धारा 29 और 30। यहां कोर्ट ने कहा:


