सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम आदेश में कहा है कि सिविल विवादों में समझौते के आधार पर पारित डिक्री को स्टाम्प शुल्क चुकाकर रजिस्टर्ड कराने की आवश्यकता नहीं है। शीर्ष कोर्ट ने 20 दिसंबर 2024 में इंदौर हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत समझौते को ही डिक्री माना गया है और इसे अलग से रजिस्टर्ड कराने का प्रावधान नहीं है। इस फैसले से तहसील कार्यालयों में नामांतरण और अन्य मामलों में लंबित प्रकरणों में पक्षकारों को बड़ी राहत मिलेगी। आमतौर पर कलेक्टर ऑफ स्टाम्प के कार्यालय में ऐसे प्रकरण भेजे जाते हैं, जहां पक्षकारों को भारी स्टाम्प ड्यूटी का भुगतान करना पड़ता है, जबकि समझौता पहले ही हो चुका होता है।
मामला : समझौते के बावजूद तहसीलदार ने रजिस्ट्री के लिए मांगे 6.67 लाख रुपए इंदौर के मुकेश नामक व्यक्ति की जमीन पर यहीं के अभय कुमार ने कब्जा करने की कोशिश की। मामला कोर्ट तक पहुंचा, पर 2013 में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया और कोर्ट ने डिक्री जारी कर दी। इसके बाद मुकेश ने 30 नवंबर 2013 को नामांतरण के लिए तहसील कार्यालय में आवेदन दिया। तहसीलदार ने इसे कलेक्टर ऑफ स्टाम्प को भेजा, जहां रजिस्ट्री के लिए 6.67 लाख रुपए की स्टाम्प ड्यूटी मांगी गई। मुकेश ने इस राशि को चुनौती दी और रेवेन्यू बोर्ड में आवेदन किया, लेकिन वहां अर्जी खारिज हो गई। 2020 में हाई कोर्ट में याचिका दायर की, लेकिन वहां से भी राहत नहीं मिली। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई, जहां शीर्ष अदालत ने फैसला मुकेश के पक्ष में दिया। अधिवक्ता आनंद अग्रवाल और वरुण रावल के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि समझौते के आधार पर पारित डिक्री को अलग से रजिस्टर्ड कराने की जरूरत नहीं है। यह फैसला तहसीलदारों के लिए राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण को आसान बनाएगा।


