श्रद्धालुओं को दिव्य चमत्कारों का अनुभव करवाया गया

आध्यात्मिक महोत्सव प्रांगण में पौराणिक काल के विभिन्न प्रसंगों को दर्शाती सुंदरतम जीवंत झांकियां श्रद्धालुओं को मोह रही है। कई राज्यों और विभिन्न पीठ, अलग अलग भगवान से जुड़ी जीवनी को लेकर 100 से अधिक झांकियां सजाई हैं। इनके माध्यम से पौराणिक देवी देवताओं के चरित्रों को बखूबी प्रस्तुत किया है। साथ ही झांकियों के द्वारा गुरुदेव की जीवनी, कथाओं का सार, विभिन्न भगवान् परिवार, धर्म के बड़े स्थलों के बारे में बताया। भास्कर संवाददाता | पाली अणुव्रत नगर के विशाल प्रांगण में सजी आध्यात्मिक नगरी में जगद्गुरु वसंत विजयानंद गिरी के श्रीमुख से भैरव कथा का रसास्वादन करने सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु जुटे। भैरव पुराण महाकथा और महालक्ष्मी महायज्ञ महामहोत्सव रविवार को यज्ञ में आहुतियां, झांकियों की प्रदर्शनी और शाम को कथा का आयोजन हुआ। यज्ञ में तीन रंग के चंदन, लाल, पीला और सफेद कलर के हजारों किलों चंदन से आहुतियां लगी। आध्यात्मिक महोत्सव में साधकों को कृष्णगिरी पीठाधीश्वर जगद्गुरू वसंत विजयानंद गिरी महाराज ने मंत्रों के उच्चारण के साथ अर्थ और उपयोग के बारे में बताया। साधना की विधियां बताई। इसके बाद कष्ट निवारण श्री महालक्ष्मी यज्ञ में आहुतियां दी। ढाई घंटे तक चले यज्ञ में दुर्लभ विधि विधान संपन्न कराए। यज्ञ कुटीर में आकर्षण का केंद्र है 108 लीटर का स्वर्ण अष्टलक्ष्मी कलश, सामने आहुतियां यज्ञ कुटीर के मुख्य हवन कुंड के सामने ही 108 लीटर का स्वर्ण अष्टलक्ष्मी कलश की स्थापना की हुई। इसके सामने जगद्गुरु वसंत विजयानंद गिरी महाराज के श्रीमुख से मंत्रोचार किया जाता है। काशी के पंडितों द्वारा आहुतियां दी जाती हैं। यह कलश पूरी तरह से गोल्ड पॉलिश किया है। सामने ही यज्ञ के मुख्य देवों की स्थापना की हैं। इसके सामने अलग-अलग मंत्रों के साथ ही आहुतियां दी जाती हैं। रात्रि में भैरव कथा में जगद्गुरु देव के प्रवचन सुनने भक्तों की भीड़ जुटी। गुरुदेव ने कहा कि भैरव देव सर्वशक्तिमान हैं। वे संसार की रक्षा के देव है। भैरव का अर्थ ही भय रहित है। कथा का आरंभ करते हुए पौराणिक प्रसंग में बताया कि जब मां पार्वती को नारद ऋषि ने प्रसन्न होकर फल दिया और कहा कि इसे पूरा खाने वाला संसार में प्रथम पूजनीय होगा। मां पार्वती ने स्नेहवश अपने पुत्र गणेश और कार्तिकेय को बुलाया। दोनों से कहा जो संसार का सबसे पहले परिक्रमा लगा कर आए उसे यह फल खाने को मिलेगा। कार्तिकेय अपने वाहन मयूर पर आरूढ़ होकर रवाना हो गए लेकिन गणेश वहीं रहे। बाल गणेश ने मां से कहा कि आप ही कहते हैं माता पिता ही संसार हैं? मां पार्वती ने सहमति दी। भगवान गणेश ने तुरंत अपनी मां की दो बार परिक्रमा की और सम्मुख खड़े हो गए। मां पार्वती अनुत्तरित खड़ी रह गई। उनके हाथ से फल सीधे भगवान गणेश की झोली में गिरा। तब से भगवान गणेश प्रथम पूज्यनीय हुए। कथा के मध्य गुरूदेव ने मधुर भजन सुनाए। कथा के मध्य कई दिव्य चमत्कारों का अनुभव भी श्रद्धालुओं को कराया गया।

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