रांची | गुरुदेव श्रीश्री परमहंस योगानन्द प्रायः कहा करते थे कि मानव जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य ईश्वर की खोज करना है। अन्य सब कुछ प्रतीक्षा कर सकता है, परंतु ईश्वर की खोज नहीं। योगानंद जी का जन्म 5 जनवरी 1893 को गोरखपुर में धर्मनिष्ठ बंगाली माता-पिता ज्ञानप्रभा और भगवतीचरण घोष के परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम मुकुन्दलाल घोष था। बचपन में मुकुन्द मां काली से गहन प्रार्थना और ध्यान किया करते थे। ऐसे ही एक अवसर पर वे एक गहन दिवास्वप्न में डूब गए और उनकी अंत:दृष्टि के सामने एक प्रखर प्रकाश कौंध गया। वे इस दिव्य प्रकाश को देखकर आश्चर्यचकित हो गए और उन्होंने पूछा, यह अद्भुत् आलोक क्या है? उन्हें इस प्रश्न का एक दैवी प्रत्युत्तर प्राप्त हुआ कि मैं ईश्वर हूं। मैं प्रकाश हूं। योगानंदजी ने अपनी पुस्तक योगी कथामृत में इस अलौकिक अनुभव का वर्णन किया है। 17 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी ईश्वर की खोज की आध्यात्मिक यात्रा शुरू की। यह खोज उन्हें उनके पूज्य गुरुदेव स्वामी श्रीयुक्तेश्वर जी के पास ले गई। अपने गुरु के प्रेमपूर्ण लेकिन कठोर मार्गदर्शन में उन्होंने स्वामी परंपरा के अंतर्गत पवित्र संन्यास का आलिंगन किया। वे अपने संन्यासी नाम परमहंस योगानंद से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने 1917 में रांची में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इंडिया (वाईएसएस) और 1920 में लॉस एंजिलिस में सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप की स्थापना की। इन दोनों संगठनों का प्राथमिक उद्देश्य है जीवन के परम उद्देश्य अर्थात आत्मा का परमात्मा से साथ एकत्व को साकार करने के लिए ‘क्रियायोग’ का प्रसार करना। भारतीय आध्यात्मिक साधना के ज्ञान के प्रसार के लिए अथक प्रय| किया योगानंदजी ने अमेरिका में रहते हुए उपरोक्त भारतीय आध्यात्मिक साधना के ज्ञान के प्रसार के लिए अथक प्रय| किया, जिसका अत्यधिक स्वागत किया गया और सराहना हुई। उनके द्वारा लिखी गई आध्यात्मिक पुस्तक योगी कथामृत ने विश्व में असंख्य लोगों को प्रभावित किया है और इस पुस्तक का 50 से अधिक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। श्रीश्री योगानन्द की शिक्षाओं में विषयों की एक विस्तृत श्रृंखला में क्रियायोग, सभी सच्चे धर्मों में विद्यमान गहन एकता, शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कल्याण को एक साथ ध्यान में रखते हुए संतुलित जीवन जीने के उपाय शामिल हैं।


