पिंजरापोल गौशाला की फोकल प्वाइंट शाखा स्थित श्री गोविंद गोधाम मंदिर में श्रीमद् भागवत सप्ताह की कथा चल रही है। चौथे दिन आचार्य हरीश शास्त्री ने समुद्र मंथन का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि अमृत पाने की इच्छा से देवताओं और असुरों ने मिलकर वासुकि नाग को रस्सी और मंदार पर्वत को मथनी बनाया। समुद्र मंथन से सबसे पहले हलाहल विष निकला। उसका प्रभाव इतना भयंकर था कि तीनों लोको में हाहाकार मच गया। तब भगवान शिव ने वह विष अपने कंठ में धारण किया और नीलकंठ कहलाए। इसके बाद कामधेनु गाय, घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, रम्भा अप्सरा, देवी लक्ष्मी, वारूणी, चंद्रमा, शारंग धनुष, पांचजन्य शंख, वैद्यराज धन्वंतरि और अंत में अमृत कलश निकला। अमृत को देखकर देवता और असुर आपस में लड़ने लगे। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर देवताओं को अमृत पान करवाया। आचार्य जी ने आगे बताया कि जब भी धरती पर पाप और अत्याचार बढ़ा है, तब भगवान ने अवतार लिया है। मथुरा के राजा कंस के अत्याचार बढ़ने पर भगवान विष्णु ने देवकी के आठवें पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण का जन्म लिया। इस अवसर पर नंदोत्सव मनाया गया। “नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की” भजन पर श्रद्धालु झूम उठे। आरती के बाद प्रसाद वितरण हुआ। इस अवसर पर गौशाला के वरिष्ठ उपप्रधान नवल गुप्ता, सचिव अजय बाजोरिया, सतीश अग्रवाल, संदीप खोसला, हीरा लाल मदान, दिनेश अरोड़ा, अमित गुप्ता सहित बड़ी संख्या में भक्तों ने कथा का आनंद लिया। श्रीमद् भागवत कथा का व्याख्यान करते आचार्य हरीश शास्त्री जी। श्री गोविंद गोधाम मंदिर में श्रीमद् भागवत कथा सुनते उपस्थित श्रद्धालु।


