श्री दुर्ग्याणा तीर्थ के श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर में मनाई वामन द्वादशी, हरिनाम संकीर्तन में गूंजे जयकारे

भास्कर न्यूज | अमृतसर दुर्ग्याणा तीर्थ के श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर में वीरवार को वामन द्वादशी मनाई गई। मंदिर के मुख्य पुजारी ओम प्रकाश ने अन्य पुजारियों के साथ मिलकर मंत्रोच्चारण करके श्री ठाकुर जी का पंचामृत स्नान करवाया। इसके बाद श्री नारायण जी को भगवान वामन का रूप धारण करवाया। जिसमें भगवान के एक हाथ में छाता तो दूसरे में कमंडल पकड़ा गया। भगवान नारायण जी के इस रूप को देखकर माथा टेकने आए भक्तजन सराबोर हो उठे। भक्तों ने मिलकर इस मौके पर पंडितों ने भक्तों को भगवान वामन की कथा सुनाई। अमृतसर| मजीठा रोड ग्रीन फील्ड स्थित श्री मुक्तिनारायण धाम वेंकटेश तिरुपति बालाजी मंदिरमें वामन द्वादशी मनाई गई। इसमें भगवान वेंकटेश्वर का दिव्य शृंगार करके वामन रूप धारण कराया। ट्रस्टियों ने संगत के साथ मिलभगवान वामन की पूजा की। भक्तों ने वामन भगवान को तुलसी पुष्प अर्चना की। पंडितों ने कहा कि यह अवतार दर्शाता है कि भगवान केवल बल या आकार से नहीं, बल्कि विचार, विनम्रता और बुद्धिमत्ता से धर्म की रक्षा करते हैं। वामन जयंती बताती है कि विनम्रता में सबसे बड़ी शक्ति होती है और सच्चा धर्म केवल बाह्य शक्ति नहीं बल्कि आत्मिक विकास और सत्य के पालन से ही स्थापित होता है। इस मौके पर चरणजीत अग्निहोत्री, चरणजीत भास्कर, रवि शर्मा, कृष्णदेव मौजूद थे। अमृतसर | हरि धाम चिन्मय मंदिर में गुरुवार को वामन अवतार का शृंगार कर भव्य उत्सव मनाया गया। इस मौके पर भक्तों को राजा बलि और भगवान वामन की कथा सुनाई गई, जिसमें भगवान विष्णु ने छोटे वामन रूप में आकर तीन पग भूमि मांगकर राजा बलि के अभिमान को शांत किया था। उन्होंने कहा कि दस अवतारों में वामन अवतार की एक ऐसी कथा है, जो शक्ति के साथ-साथ विनम्रता, बुद्धिमत्ता और धर्म की सर्वोच्चता को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि असुरों के राजा बलि ने तप और दान के बल पर तीनों लोको पर अधिकार प्राप्त कर लिया। तभी देवताओं में चिंता फैल गई। तब भगवान विष्णु ने एक छोटे से ब्राह्मण बालक का रूप धारण करके राजा बलि के यज्ञ में पहुंचे और दान में केवल तीन पग भूमि मांगी। बलि ने वचन दिया और तभी वामन ने अपना विराट रूप प्रकट किया। पहले पग में पृथ्वी, दूसरे में आकाश और तीसरे पग में बलि का सिर रखकर उसे पाताल भेज दिया। लेकिन उसके दान, तप और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने बलि को अमरता का वरदान दिया और पाताल लोक का अधिपति बनाया।

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