संतुलित उर्वरक प्रयोग और वैज्ञानिक प्रबंधन से प्याज की अच्छी पैदावार होगी

भास्कर न्यूज |गिरिडीह जिले भर में प्याज की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है, लेकिन विभिन्न रोगों के कारण इसकी उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। समय पर रोग की पहचान व उचित प्रबंधन से होने वाले नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है। कृषि वैज्ञानिक मधुकर कुमार ने बताया कि समय पर रोग पहचान, संतुलित उर्वरक प्रयोग और वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाकर किसान प्याज की अच्छी पैदावार प्राप्त कर सकते हैं। बेसल रॉट रोग में पत्तियां ऊपर से नीचे की ओर पीली होकर सूखने लगती हैं। कंद नरम होकर सड़ जाता है और जड़ों में भी सड़न आ जाती है। बचाव के लिए फसल चक्र अपनाना, खुदाई के बाद सुरक्षित भंडारण करना तथा कॉपर की कमी वाली मिट्टी में कॉपर उर्वरकों का प्रयोग आवश्यक है। रोग दिखाई देने पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 0.25 प्रतिशत से मिट्टी में ड्रेंचिंग करें। सफेद गलन रोग में जमीन के पास पौधे का भाग गलने लगता है तथा सफेद फफूंद के साथ सरसों के दाने जैसी संरचनाएं (स्क्लेरोटिया) दिखाई देती हैं। इसके नियंत्रण के िलए मई–जून में हल्की सिंचाई के बाद गहरी जुताई करें तथा ट्राइकोडर्मा हारजिएनम को गोबर की खाद में मिलाकर खेत में डालें। रोपाई से पहले पौध व कंदों को कार्बेन्डाजिम से उपचारित करना लाभकारी है। डाउनी मिल्ड्यू रोग में पत्तियों पर सफेद धब्बे बनते हैं, जो अधिक नमी में तेजी से फैलते हैं। इसके लिए प्रमाणित बीज का प्रयोग करें तथा रोपाई के 20 दिन बाद से मैंकोजेब 0.2 प्रतिशत का छिड़काव 10–12 दिन के अंतराल पर करें। पाइथियम रूट सड़ांध एवं बोट्राइटिस रोग बीज और पौध अवस्था में अधिक नुकसान पहुंचाते हैं। बीजों को थीरम या कैप्टान से उपचारित करना तथा अंकुरण के बाद कॉपर ऑक्सीक्लोराइड से ड्रेंचिंग करना प्रभावी उपाय है। बैंगनी धब्बा रोग में पत्तियों पर बैंगनी-भूरे धब्बे बनते हैं। जल निकास की अच्छी व्यवस्था रखें और कॉपर ऑक्सीक्लोराइड, क्लोरोथालोनिल या मैंकोजेब का छिड़काव करें।गर्दन सड़न रोग प्रायः कटाई के बाद भंडारण में दिखाई देता है। बचाव के लिए कटाई के बाद प्याज का अधिक ढेर न लगाएं और खुले, हवादार स्थान पर भंडारण करें। आप खेती-किसानी से जुड़े किस विषय पर जानकारी चाहते हैं, वॉट्सएप नंबर 7 004690495 पर सिर्फ मैसेज करें।

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