‘सफेद चादर’ स्वर्ण सिंह का पैतृक घर खंडहर:जालंधर में दीवारें टूट रही, छतें गिरने की कगार पर; संविधान में ‘मौलिक कर्तव्य’ जोड़ने में भूमिका निभाई

भारत का संविधान सिर्फ कागजों का दस्तावेज नहीं है, बल्कि उन महान लोगों की सोच का नतीजा है, जिन्होंने देश का भविष्य बनाया। ऐसे ही एक महान व्यक्ति थे सरदार स्वर्ण सिंह, जिनका नाम संविधान बनाने वालों में शामिल है। पंजाब के जालंधर जिले के गांव शंकर से ताल्लुक रखने वाले सरदार स्वर्ण सिंह ने देश के संविधान में ‘मौलिक कर्तव्यों’ को जोड़ने में अहम भूमिका निभाई थी। दैनिक भास्कर की टीम जब उनके पैतृक गांव शंकर पहुंची, तो हालात देखकर हैरानी हुई। जिस गांव ने देश को इतना बड़ा नेता दिया, वहां आज उनकी यादें उपेक्षा का शिकार हैं। गांव की तंग गलियों में स्थित सरदार स्वर्ण सिंह का पैतृक घर अब पूरी तरह खंडहर बन चुका है। दीवारें टूट रही हैं और छतें गिरने की कगार पर हैं। इस घर में अब परिवार का कोई सदस्य नहीं रहता। इसके अलावा गांव के गुरुद्वारे के पीछे वह कोठी भी मौजूद है, जहां मंत्री बनने के बाद सरदार स्वर्ण सिंह रहा करते थे। कभी यह कोठी राजनीतिक बैठकों और वीआईपी आवाजाही का केंद्र हुआ करती थी, लेकिन आज यह भी वीरान पड़ी है। इन हालातों को देखकर यही सवाल उठता है कि जिस नेता ने देश को कर्तव्यों और अनुशासन का पाठ पढ़ाया, उनकी यादों को संभालने वाला आज कोई क्यों नहीं है। ईमानदारी की मिसाल, लोग कहते थे ‘सफेद चादर’ गांव में स्वर्ण सिंह की जमीनों की देखरेख करने वाले केयरटेकर बिट्टू ने दैनिक भास्कर से बातचीत में कई अन-सुने किस्से साझा किए। बिट्टू कहते हैं कि सरदार स्वर्ण सिंह ईमानदारी का जीता-जागता पुलिंदा थे। उनकी निष्पक्षता और साफ-सुथरी छवि के कारण इलाके के लोग उन्हें प्यार और सम्मान से ‘सफेद चादर’ कहकर पुकारते थे। राजनीति की कीचड़ में रहकर भी उन पर कभी कोई दाग नहीं लगा। वकालत का उसूल, अपनों के खिलाफ नहीं लड़ा केस स्वर्ण सिंह पेशे से एक काबिल वकील थे। बिट्टू ने एक दिलचस्प वाकया बताया कि जब वे वकालत करते थे, तब वे अपने इलाके (शंकर और आसपास) का कोई भी केस नहीं लड़ते थे। जब उनसे इसका कारण पूछा जाता, तो वे बड़ी सादगी से कहते थे, “इस इलाके के सभी लोग मेरे अपने हैं, मैं अपनों के खिलाफ कोर्ट में खड़ा होकर केस नहीं लड़ सकता।” यह उनके उच्च नैतिक मूल्यों का प्रमाण था। संविधान निर्माण और स्वर्ण सिंह समिति का योगदान सरदार स्वर्ण सिंह ने संविधान सभा के सदस्य के रूप में पंजाब का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने संविधान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को शामिल करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी सबसे बड़ी पहचान ‘स्वर्ण सिंह समिति’ के रूप में है। आपातकाल के दौरान संविधान में बदलावों का सुझाव देने के लिए बनी इसी समिति की सिफारिशों पर ऐतिहासिक 42वां संशोधन हुआ। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आज हम संविधान में जिन ‘मौलिक कर्तव्यों’ (Fundamental Duties) को पढ़ते हैं, वे सरदार स्वर्ण सिंह के ही सुझाव पर जोड़े गए थे। उनका मानना था कि अधिकारों के साथ-साथ नागरिकों के कुछ कर्तव्य भी होने चाहिए। सबसे लंबे समय तक कैबिनेट मंत्री रहने का रिकॉर्ड सरदार स्वर्ण सिंह के नाम भारत के सबसे लंबे समय (1952 से 1975) तक कैबिनेट मंत्री रहने का रिकॉर्ड दर्ज है। उन्होंने विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री और रेल मंत्री जैसे कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का पक्ष रखने में उनकी चतुराई और कूटनीति का लोहा पूरी दुनिया मानती थी। जालंधर के इस सपूत ने देश को ‘मौलिक कर्तव्य’ दिए, लेकिन शायद हम एक समाज के रूप में अपना कर्तव्य भूल गए। उनकी खंडहर होती कोठी इस बात की गवाह है कि हम अपनी राजनीतिक विरासतों को सहेजने में कितने पीछे हैं।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *