आपने सौ, पांच सौ हजार और अब दो हजार तक के नोट देखे हैं, पुराने जमाने के नोट भी देखें होंगे जो कि रिजर्व बैंक की तरफ से छपते थे। लेकिन क्या आपने कभी एक रूपए का वो नोट देखा हैं जो सबसे पहले भारत में छपा था। देश में पहले अलग अलग करेंसी का उपयोग लेन देन के लिए किया जाता था। अलग अलग धातुओं की मुद्राएं चलन में थी। बाद में चांदी के सिक्कों का चलन हुआ और फिर उसके बाद साल 1917 में आया पहला एक रूपए का नोट। जिसके बाद नोट छापने की प्रक्रिया शुरू हुई। कोटा में आयोजित हो रहे दुर्लभ करेंसी प्रदर्शनी में इसी तरह के पुराने और दुर्लभ करेंसी और स्टांप के बारे में लोगों को बताया जा रहा है। इनका कलेक्शन रखने वाले अलग अलग राज्यों से कोटा पहुंचे है। इनमें से ही एक उज्जेन के शिवम वर्मा के पास पुराने और एंटीक नोटों का कलेक्शन है। पहले विश्वव युद्ध के समय आया एक रूपए का नोट
शिवम बताते हैं कि देश में एक रूपए के पहले नोट की छपाई अंग्रेजों के समय हुई थी। वह समय विश्व युद्ध का था। इस दौरान देश में चांदी के सिक्के का चलन था। पहले विश्वयुद्ध के दौरान चांदी के सिक्कों की ढ़लाई नहीं हो पाने की वजह से एक रूपए के नोट की छपाई का रास्ता साफ हुआ। साल 1917 को एक रूपए के नोट की छपाई हुई। इस नोट पर ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम की तस्वीर छपी थी। नौ साल तक एक रूपए का नोट छपता रहा। हालांकि इसे 1926 में बंद कर दिया गया लेकिन बाद में इसे 1940 में फिर से छापना शुरु कर दिया गया जो 1994 तक जारी रहा। बाद में इस नोट की छपाई 2015 में फिर शुरु की गई। हालांकि इसकी डिजाइन में चेंज होता रहा लेकिन इसे भारतीय रिजर्व बैंक जारी नहीं करता बल्कि भारत सरकार ही इसकी छपाई करती है। कानूनी आधार पर यह एक मात्र वास्तविक करेंसी नोट है बाकी सब नोट धारीय नोट (प्रोमिसरी नोट) होते हैं जिस पर धारक को उतनी राशि अदा करने का वचन दिया गया होता है। जीरो नंबर का नोट, कीमत लाख तक
आज जो नोट छपते हैं उनमें सौ रूपए के नोट भी शामिल है। नोट छापने से पहले उसका सैंपल छापकर तैयार किया जाता है। इस प्रदर्शनी में यह सैंपल नोट भी देखने को मिला। इस नोट की कीमत अलग अलग नोट कलेक्टर अलग अलग तय करते है और उसकी अनुसार इसे कलेक्टर कर अपने संग्रह में रखते है। दस हजार से लेकर दो लाख तक में नोट मिल जाता है। शिवम बताते हैं कि नोट की कीमत कलेक्टर के लिए अहम नहीं होती, नोट कितना पुराना होता है, कंडीशन क्या है उस पर निर्भर करता है। स्पेसमैन नोट, छपाई से पहले छपने वाला सैंपल होता है जिसमें नोट के क्रमांक नंबर भी जीरो जीरो ही होते है। 1996 से 2002 के बीच छपे सौ के नोट का सैंपल नोट कलेक्शन में शामिल है। 1880 में चार आने का स्टांप, गत्ते की करेंसी
आज के समय हर लिखापढ़ी के लिए स्टांप जरूरी होता है। ऐसा अंग्रेजो के समय से चला आ रहा है। उस समय एक आने से लेकर चार आने तक के स्टांप आते थे। जिन पर रानी विक्टोरिया की टिकट होती थी। प्रदर्शनी में बीकानेर के किशन सोनी ने बताया कि ब्रिटिश राज में 1840 से स्टांप आना शुरू हुए थे। इन स्टांप में छपाई में सैकडों बाद इंडिया छोटे छोटे अक्षरों में छपा रहता था। पहले विक्टोरिया, फिर एडवर्ड और फिर जॉर्ज पंचम के टिकट के स्टांप आते थे। इसके बाद स्टेट के भी आते थे। बाद में स्टेट के भी स्टेंप बंद हो गए थे। इसके अलावा बीकानेर रियासत में चली गत्ते की करेंसी भी प्रदर्शनी में शामिल हुई है। इन्हें इमरजेंसी करेंसी भी कहा जाता है जो कि अस्थाई करेंसी थी। दरअसल, दूसरे विश्व युद्ध के दौरान और उसके बाद धातुओं की कमी के चलते सिक्के ढालने में परेशानियां आने लगी थी। जिसके बाद कई रियासतों ने गत्ते की करेंसी शुरू की। इन करेंसी का उपयोग चीजों के लेनदेन में किया जाने लगा था। इसमें गत्ते पर अलग अलग आने की छपाई होती थी। प्रदर्शनी में अलग अलग रियासतों के दौर के स्टांप भी है। वहीं इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया का एक चैक भी है जो कि लाहौर ब्रांच का है जो पहले भारत में ही शामिल था। इनके नोटों के कलेक्शन में एक नोट एक हजार का भी है, जिसमें सुभाष चंद्र बोस की तस्वीर है। यह नोट बैंक ऑफ गुडलक अनलिमिटेड नाम से छपा हुआ है। जिसमें एक तरफ चरखा तो दूसरी तरफ सुभाष चंद्र बोस की तस्वीर शामिल है।


