पतंगों का एशिया का सबसे बड़ा बाजार जयपुर के हांडीपुरा में है। यहां करीब 400 दुकानें हैं, जहां लगभग 150 प्रकार की पतंगें बनती हैं। ये पतंगें जयपुर अलावा मेरठ, बीकानेर, दिल्ली, पंजाब और दुबई के बाजारों में भी जाती हैं। खास बात यह है कि पतंग में लगने वाली लकड़ी कोलकाता से आती है, इसे कांप और थुड्डा कहते हैं। पन्नी गुजरात से आती है। पतंगें महिलाएं तैयार करती हैं और दुकानों पर पुरुष बेचते हैं। पतंग विक्रेता मो. फुरकान ने बताया कि 60 साल पुरानी दुकान है। 80 प्रकार की पतंगें हैं। कीमत 5 से 1500 रु. है। पतंगें कलश, तितली और परी जैसे आकार की होती है। यहां फरवरी से वापस पतंग का काम शुरू हो जाएगा। ऐसे में सालभर यहां पतंगें तैयार होती हैं। ताहिर अंसारी कहते हैं एक दिन में 8-10 जनों का परिवार 2 हजार पतंगें तैयार करता है। महिलाएं तैयार करती हैं एक दिन में हजार से ज्यादा पतंगें एक घर के भीतर गई तो वहां पतंगों का ढेर लगा था। नफीसा पतंग में कांप चढ़ाने का काम कर रही थीं। वे यह काम पिछले तीस साल से कर रही हैं। उसी घर की पहली मंजिल पर 55 वर्षीय अफरोज पतंग तैयार कर रही थीं। वे 35 साल से ये काम कर रही हैं। वहीं उनकी 6 साल की पोती मंजो भी उनकी मदद कर रही थी। उन्होंने बताया कि मैं सुबह 8 से शाम 7 बजे तक काम करती हूं और एक दिन में एक हजार पतंगें तैयार करती हूं, जिसके मुझे 200 रुपए मिलते हैं। पतंग पर लगने वाली लकड़ी को गोंद से चिपकाया जाता है जो घर पर तैयार किया जाता है। मैदा और नीला थोता (जहर) को मिलाकर और पकाकर गोंद तैयार किया जाता है। पतंगों को चूहों से बचाने के लिए नीला थोता डाला जाता है। 250 ग्राम गोंद में वे पूरे हफ्ते का काम चलाती हैं। एक हफ्ते में वे 1200 रुपए कमाती हैं। जब मैंने पूछा कि सिर्फ महिलाएं ही पतंगे क्यों तैयार करती हैं, जवाब आया शुरू से ही ऐसा होता आया है।


