‘सरकारी वकीलों की नियुक्ति में वंचित वर्गों को प्रतिनिधित्व मिले’:सुप्रीम कोर्ट ने AG को कहा- मौका नहीं देंगे तो ये आगे कैसे आएंगे

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मध्य प्रदेश में सरकारी वकीलों की नियुक्ति में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) समेत वंचित वर्गों के लिए आरक्षण की मांग वाली याचिका का निपटारा कर दिया। अदालत ने साफ किया कि वैधानिक प्रावधान के अभाव में वह इस मामले में कोई बाध्यकारी निर्देश जारी नहीं कर सकती, लेकिन साथ ही एडवोकेट जनरल से अपेक्षा जताई कि नियुक्तियों में हाशिए पर पड़े समुदायों और महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए। यह आदेश न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने दिया। याचिका में आरोप लगाया गया था कि हाल ही में महाधिवक्ता कार्यालय द्वारा की गई नियुक्तियों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी वकीलों की भागीदारी बेहद कम है। कोर्ट की अहम टिप्पणी हालांकि, पीठ ने यह भी साफ किया कि भले ही यह कानूनी अधिकार न हो, लेकिन इस पर विचार किया जाना जरूरी है। न्यायमूर्ति सुंदरेश ने कहा- “एडवोकेट जनरल बार के नेता होते हैं। अगर इन वर्गों को अवसर नहीं दिया जाएगा, तो वे आगे कैसे आएंगे?” “ST समुदाय से एक भी वकील नहीं” सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि हालिया नियुक्तियों में अनुसूचित जनजाति समुदाय से एक भी वकील को शामिल नहीं किया गया, जबकि अनुसूचित जाति के वकीलों की संख्या भी सीमित रही। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि सरकारी वकीलों की नियुक्ति का लंबी अवधि में न्यायपालिका पर असर पड़ता है, क्योंकि कई मामलों में इन्हीं सरकारी वकीलों को आगे चलकर न्यायाधीश बनाए जाने पर विचार किया जाता है। कोर्ट का सवाल: क्या इसे अधिकार बनाया जा सकता है? न्यायमूर्ति सुंदरेश ने सवाल उठाया कि क्या इस तरह की नियुक्तियों में आरक्षण को अधिकार के रूप में लागू किया जा सकता है। उन्होंने टिप्पणी की कि महाधिवक्ता को अपनी टीम चुनने का अधिकार होता है। न्यायमूर्ति कोटेश्वर सिंह ने भी कहा कि एडवोकेट जनरल के बदलते ही सरकारी वकीलों की टीम बदलना सामान्य प्रक्रिया है। राज्य सरकार का पक्ष राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और अन्य न्यायालयों में राज्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए अपनी टीम नियुक्त करना एडवोकेट जनरल का विशेषाधिकार है और ऐसी नियुक्तियां वैधानिक आरक्षण नियमों के तहत नहीं आतीं। कोर्ट की अहम टिप्पणी हालांकि, पीठ ने यह भी कहा कि भले ही यह कानूनी अधिकार न हो, लेकिन इस पर विचार किया जाना जरूरी है। न्यायमूर्ति सुंदरेश ने कहा कि एडवोकेट जनरल बार के नेता होते हैं और यदि वंचित वर्गों को अवसर नहीं मिलेगा तो वे आगे नहीं बढ़ पाएंगे। आदेश में क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आरक्षण लागू करने का निर्देश देने का कोई वैधानिक आधार नहीं है, लेकिन अदालत ने एडवोकेट जनरल से अनुरोध किया कि नियुक्तियों के दौरान यह सुनिश्चित करें कि हाशिए पर रहने वाले समुदायों और महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व मिले। इसके साथ ही याचिका का निपटारा कर दिया गया। ओबीसी वकील बोले: ये ऐतिहासिक निर्णय
ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन के वकील वरूण ठाकुर ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कहा- मप्र हाईकोर्ट ने एक रिट पिटीशन यह कहकर खारिज की थी कि एडवोकेट जनरल ऑफिस में क्रियान्वित नहीं हो सकता क्योंकि ये शुद्ध रूप से कॉन्ट्रेक्चुअल पोस्ट है। इस मामले को लेकर हम लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में एक एसएलपी फाइल की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई करते हुए कहा कि सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। हम लोगों ने कोर्ट को बताया कि एससी, एससी, ओबीसी, और महिलाओं का प्रतिनिधित्व नहीं है। वर्तमान के महाधिवक्ता हों या इससे पहले के एडवोकेट जनरल हों। इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने आज मप्र सरकार और एडवोकेट जनरल ऑफिस को यह निर्देश दिया है कि आप इन वंचित वर्गों की नियुक्तियों का ध्यान रखेंगे। भले ही ये अनुबंध का पद है लेकिन, इन वर्गों का प्रतिनिधित्व होना जरूरी है। आदिवासी वर्ग के लिए कोर्ट ने खासकर कहा है कि एसटी वर्ग के कुछ अधिवक्ताओं को जल्दी को-ऑप्ट किया जाना चाहिए। ये बहुत बड़ी जीत है। क्योंकि जैसे ही सरकारी वकील बनते हैं ये हायर ज्यूडिशियरी में जज बनने का पहला स्टेप होता है। आज की स्थिति में लॉ मिनिस्टर ने जो रिकॉर्ड पेश किया था उसमें बताया था कि एससी, एसटी, ओबीसी और महिलाओं की भागीदारी नगण्य है।

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