सरकार ने 57 करोड़ दे दिए, छात्राओं को पता नहीं:खाते में सैनिटरी पैड के पैसे आ रहे, जिम्मेदारों ने भूल मानी, कहा- जागरूकता अभियान चलाएंगे

मध्यप्रदेश सरकार स्कूली छात्राओं के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए स्वच्छता और स्वास्थ्य/सेनिटेशन-हाइजीन योजना चला रही है। हालांकि ज़मीनी स्तर पर इस योजना का लाभ छात्राओं को नहीं मिल पा रहा है। एक छात्रा को सालभर में लगभग 3 हजार रुपए के सैनिटरी पैड की ज़रूरत होती है, जबकि सरकार की ओर से सिर्फ 300 रुपए सालाना दिए जा रहे हैं। यह राशि भी सीधे छात्राओं के बैंक खातों में भेज दी जाती है। मजाक ये है कि अधिकांश छात्राओं को यह जानकारी ही नहीं होती कि यह पैसा सैनिटरी पैड के लिए है, इसलिए वे इसे छात्रवृत्ति समझकर दूसरी ज़रूरतों में खर्च कर देती हैं। स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा प्रदेश की 19 लाख 6 हजार 137 छात्राओं के खातों में 57 करोड़ से अधिक रुपए सैनेटरी पैड खरीदने के लिए ट्रांसफर किए गए। इनमें ग्वालियर जिले के 3,478 स्कूलों की 93,466 छात्राओं के खाते में 15 लाख पहुंचे। इस योजना की जमीनी हकीकत जानने के लिए जब दैनिक भास्कर पड़ताल की तो सामने आया कि स्कूलों में न सैनिटरी पैड उपलब्ध कराए गए और न ही छात्राओं को इस योजना के बारे में सही जानकारी दी गई। जिम्मेदारों ने भूल मानी, कहा- जागरूकता अभियान चलाएंगे भास्कर ने जब स्कूल शिक्षा विभाग के डीईओ हरिओम चतुर्वेदी से इस बारे में बात की तो उन्होंने कहा कि इस बारे में छात्राओं को पर्याप्त जानकारी नहीं दे पाए। अब संकुल प्राचार्यों और शिक्षकों के जरिए सैनिटरी पैड के लिए सरकार द्वारा भेजी जाने वाली राशि के बारे में छात्राओं को अवगत कराया जाएगा। साथ ही सरकारी स्कूलों में जागरूकता अभियान चलाएंगे। बैंक कटौती से टूटी कमर, कपड़ा इस्तेमाल की मजबूरी पड़ताल में सामने आया कि खातों में आने वाली इस छोटी रकम में से भी पहले बैंक चार्ज कट जाते हैं। बची रकम इतनी कम होती है कि उससे सैनिटरी पैड खरीदना नामुमकिन हो जाता है। मजबूरी में छात्राएं आज भी कपड़ा जैसे पारंपरिक और असुरक्षित विकल्प इस्तेमाल कर रही हैं। नतीजा- वे कई गंभीर बीमारियों का शिकार हो रही हैं। छात्राएं बोलीं- पैसे तो आए लेकिन जानकारी नहीं थी सरकारी स्कूलों की छात्राओं से बातचीत में खुलासा हुआ कि वे इस रकम को स्कॉलरशिप समझकर खर्च कर रही हैं। न तो उन्हें स्कूल में कभी मुफ्त सैनिटरी पैड मिले और न ही किसी शिक्षक या प्रबंधन ने बताया कि सरकार पैड के लिए सालाना 300 रुपए दे रही है। लेकिन हमें किसी ने इस बारे में जानकारी नहीं दी। 3 केस… जो सिस्टम पर सवाल खड़े कर रहे केस-1 गंदे कपड़े के इस्तेमाल से कैंसर की शुरुआत, अब दवा खर्च भी मुश्किल 17 वर्षीय नाजिमा (परिवर्तित नाम) को लंबे समय तक गंदे कपड़े के इस्तेमाल से गंभीर संक्रमण हुआ। जांच में वजाइनल कैंसर की शुरुआती स्टेज सामने आई। खाते में लाड़ली लक्ष्मी योजना के 1250 और सैनिटरी पैड के 300 कुल 1550 रुपए आए, जिसमें से 200 रुपए बैंक कटौती में चले गए। बची रकम से पढ़ाई और इलाज दोनों मुश्किल हो गए। केस-2 850 में से बैंक ने 200 काटे, कैसे खरीदे सालभर के लिए सैनिटरी पैड 15 वर्षीय सरला (परिवर्तित नाम) को कपड़ा इस्तेमाल करने से हेवी फंगल इंफेक्शन हो गया। दर्द इतना बढ़ा कि स्कूल जाना बंद हो गया। उसके खाते में मेधावी छात्रा स्कॉलरशिप के ~550 और सैनिटरी पैड के ~300 कुल ~850 आए। जिसमें से करीब 200 रुपए बैंक ने काट लिए। सालभर के लिए सिर्फ ‌650 बचे। केस-3 1 साल में 3300 रुपए मिले, 542 बैंक कटौती से बढ़ा आर्थिक बोझ 17 वर्षीय सिमरन (परिवर्तित नाम) पिछले कई महीनों से पुराने कपड़े का इस्तेमाल कर रही थी। इससे उसे बार-बार यूटीआई और पेट दर्द की शिकायत रही। खाते में एससी कैटेगरी में स्कॉलरशिप के 3000 और सैनिटरी पैड के 300 रु. कुल ~3300 आए, जिसमें से ~542 बैंक चार्ज में कट गए। पैसा घर व पढ़ाई में खर्च हो गया, पैड खरीदना संभव नहीं हो पाया।

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