सरगुजा जिले के सरगंवा में रेबीज संक्रमित कुत्ते द्वारा काटे गए बकरे का मीट खाने वाले ग्रामीणों की स्वास्थ्य विभाग ने कैंप लगाकर जांच की। चिकित्सकों ने कहा कि मीट खाने वाले ग्रामीणों को इस मामले में खतरे की गुंजाइश नहीं है। चिकित्सकों ने ग्रामीणों की जांच की और उन्हें परामर्श दिया। शिविर में बड़ी संख्या में ग्रामीण पहुंचे थे। दरअसल, सरगवां में ग्रामीणों द्वारा निकाली पूजा का आयोजन 28 दिसंबर को किया गया था, जिसमें 12 से 15 बकरों की बलि दी गई थी। बाद में बकरों के मांस का बंटवारा किया गया और बकरे का मांस प्रसाद के रूप में पकाकर गांव के करीब 400 लोगों ने खा लिया। जिन बकरों की बलि दी गई थी, उनमें से एक बकरे को पहले एक पागल कुत्ते ने काट लिया था। स्वास्थ्य विभाग ने लगाया कैंप, की जांच
मामले की जानकारी सरपंच, उपसरपंच एवं ग्रामीणों ने स्वास्थ्य विभाग को दी। बुधवार को डा. शैलेंद्र गुप्ता के नेतृत्व में गांव में स्वास्थ्य कैंप लगाया गया। कैंप में बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने पहुंचकर हेल्थ चेकअप कराया। डा. शैलेंद्र गुप्ता एवं अन्य चिकित्सकों ने ग्रामीणों को समझाईश दी कि ग्रामीणों को रेबीज का खतरा नहीं है। बकरे का मांस पकाने के बाद रेबीज के वायरल हों तो भी मर जाते हैं। इस कारण ग्रामीणों को परेशान होने की बात नहीं है। ग्रामीणों में दहशत हुई कम
ग्रामीणों ने बताया कि ‘निकाली पूजा’ स्थानीय देवी-देवताओं की परंपरागत पूजा है। इस पूजा में बकरे की बलि देने की परंपरा चली आ रही है। गांव के नान्हू राजवाड़े से खरीदकर जिस बकरे की बलि दी गई थी, उसे पूर्व में पागल कुत्ते ने काटा था। इसकी जानकारी मिलने पर सरपंच नारायण प्रसाद व उपसरपंच कृष्णा सिंह पर भी ग्रामीण लापरवाही का आरोप लगा रहे थे। स्वास्थ्य विभाग की जांच के बाद ग्रामीणों ने राहत की सांस ली है। बकरे में नहीं थे रेबीज के लक्षण
चिकित्सक डा. शैलेंद्र गुप्ता ने बताया कि रेबीज एक घातक बीमारी है। इस मामले में ग्रामीणों ने बताया कि कुत्ते द्वारा काटे गए बकरे में रेबीज के लक्षण नहीं थे। वह सामान्य व स्वस्थ था। ग्रामीणों में कई प्रकार की भ्रांतियां थीं, जिसे दूर किया गया। मांस खाने वालों की जांच की गई। सभी स्वस्थ हैं।


